ISSN NO: 2581-8074 मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान की अन्तर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका (Multidisciplinary) Peer Reviewed Journal

ग़म के नाम…

कुलदीप सिंह
कविता

दुनिया वालो तुम ही बता दो कितना वो ज़ुबान का सच्चा था

किसी तरह मेरे दिल से उतर जाता वो शख़्स तो अच्छा था

जाने क्यों रह रह कर इस ख़राबे में मुझे तेरी याद आती है

तुझे भुलाने की मेरी कोशिशें कामयाब होती तो अच्छा था

बहुत हसरतें लिए आते हैं तिरे दर पे मेरे महबूब मेरे मौला

इक इबादत हमारी भी मुक़म्मल हो जाती तो अच्छा था

दरवाज़े थे सारे बंद उस बीमार की दवा दारू कराता मैं कैसे

ख़ुशी न देता वो मुझे अपने सारे ग़म दे देता तो अच्छा था

अबके बयाबान में है इंसां गर्दिशें-ज़ीस्त के हाल हैं कुछ और

टूट गए हैं बेहिसाब जो उन्हें पनाह मिल जाती तो अच्छा था

दरीचा मुंतजिर था दिल-ए-दहलीज़ पे दस्तक देने

तुम यारो कभी यूँ ही चले आते मेरी ख़बर लेने तो अच्छा था

बिन तुझ बेरंग है सब मसर्रत-ए-जिन्दगी तिरी सोहबत में है

साथी मेरे यकबार दोस्तदारी निभाने आ जाता तो अच्छा था

भले दिनन की वो यादें बातें वो हमारी वाबस्तगी वल्लाह गर

दिल ये मेरा बेकारी में हाय हाय न करता तो अच्छा था

इतना परेशां था कि दिले-नादां ने तअल्लुक तोड़ दिया ख़ैर

दौर-ए-ग़म-ए-ज़िन्दगी-ओ-जंग जारी रखता तो अच्छा था

हाय ये ईद भी यूँ ही बीत गयी हर बस्ती वाला आहें भरता था

उस रहबर की ज़माने पे निगहबानी हो जाती तो अच्छा था

वाह गुलशन-ए-बहार ये नया रंग – ओ – नयी फ़िज़ा जाने जाँ

मुबारक हो दिल मेरा भी होता किसी काम का तो अच्छा था

अजीब रोग लग गया है जो तबियत को मेरी उदास रखता है

ये वक़्त-ए-सितम किसी तरह गुज़र जाता तो अच्छा था