ISSN NO: 2581-8074 मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान की अन्तर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका (Multidisciplinary) Peer Reviewed Journal

कलंक

प्रवीण कुमार सहगल
कहानी

सुबह का समय है। रामस्वरूप आंगन में सिर पकड़े बैठे हैं। लज्जा और क्षोभ से सिर झुका है। आंसुओं की लगातार धार से लेई भीगती चली जा रही है। वहीं जमीन पर दोनों बच्चे, एक की उम्र तीन साल, दूसरे की पांच साल, खेल रहे हैं। मां को ढूंढ़ते हुए बार-बार रसोई की तरफ जाते और निराश लौटकर पुनः खेलने लग जाते। जब छोटा बच्चा रोने लगा और पूजा से चुप नहीं हुआ तो वह उसका हाथ पकड़, सहारे से उठाकर पिता के पास ले गयी। रामस्वरूप एक बार सिर ऊपर किये, इन मासूमों को माता के लिए रोते देख और बिलख पड़े। यह वह समय था जब उन्हें गर्म दूध के साथ बिस्कुट, पावरोटी और भरपेट भोजन मिल जाता था। पांच साल की बच्ची पिता को दुःखी, रोते देख कुछ न बोली, किन्तु अंकुर भूख से रो रहा था। अनुराधा इस समय तक दोनों बच्चों को खिला देती थी। रामस्वरूप ने उन्हें प्यार से गले लगा लिया।

पूजा ने मासूमियत से पूछा, “अम्मा कहां है पापा?”

रामस्वरूप कुछ न बोले, आवाज ही न निकलती थी। रोते-रोते घिघ्घी बंध गयी थी। आंखों से अश्रुधारा रूकने का नाम न लेती थी। वह उठे और अलमारी से बिस्कुट लाकर खिलाने लगे। रोते थे और खिलाते थे, पूजा पिता के आंसू पोंछ रही थी। सहसा बाहर से दूधवाले ने आवाज लगाई। झटपट आंखें पोंछकर रसोई से बर्तन लेकर दरवाजे पर जा पहुंचे।

दूधवाला दूध देते हुए, अंदर झांकता हुआ बोला, “आज भाभीजी दिखाई नहीं दे रही हैं, तबीयत तो ठीक है न?” रामस्वरूप को ऐसा गुस्सा आया कि सब्जी काटने वाले चाकू से उसका सीना चीर दे। इन्हीं लालसा और वासना, पिपासायुक्त, नीच लोगों के कारण मेरा घर बर्बाद हो गया, मेरे बच्चे अनाथ हो गये। वह खून का घूंट पीकर रह गया। अंदर आकर दरवाजा बंद कर दिया। रामस्वरूप की लाल-लाल अश्रुसिंचित सूजी आंखें, कपोलों पर सुखे आंसू और उदास, मलिन मुख देखकर दूधवाले को आशंका ने घेर लिया।

रामस्वरूप दूध लेकर अंदर आये और गैस-चूल्हा जलाकर दूध गर्म किया, आटा निकाला और गूंथने लगे। रोते थे और आटा गूंथते थे। कई बूंद आंसू आटे के साथ सन गयीं। उन्हें तो भूख बिल्कुल भी नहीं थी, किन्तु इन बच्चों के लिए रोटी बनाना आवश्यक था। दोनों बच्चे इन्हीं के पास आकर खेल रहे थे, किन्तु खेलने में उनका मन न लगता था। वे कभी इस कमरे में जाते, कभी उस कमरे में, कभी आशा भरी निगाहों से छत पर देखते तो कभी आंगन में, कभी मुख्य दरवाजे पर जाकर उसकी सिटकनी खोलने का असफल प्रयास करते। शायद उन्हें अम्मा को पड़ोस में जाने का गुमान हो रहा था। उनकी निर्दोष, निश्छल, व्याकुल आंखें हर जगह माता को ढूंढ रही थी। उन्हें क्या पता कि उनके सिर से माता की छत्रछाया उठ गयी और अब इस जीवन में कभी न मिलेगी। नियति इन मासूम बच्चों के साथ कैसा हृदय-विदारक क्रूर मजाक कर चुकी थी।

रामस्वरूप कच्ची, टेढ़ी-मेढ़ी रोटियां पकाते हुए सोच रहे थे-ईश्वर किसी को सुन्दरता का अभिमान और घमण्ड न दे। मैंने अपनी तरफ से कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दी। उसकी सारी आवश्यकताओं को पूरा करता गया। मां-बाबूजी जी से लड़-झगड़कर इसे यहां लाया। इसके कहने पर इसे मोबाइल खरीदकर दिया, यही मेरी सबसे बड़ी गलती थी। घर पर रहती तो उनकी देखरेख में रहती, स्वतंत्र छोड़ने का कारनामा भुगत लिया। मैं दिन भर स्कूल में पढ़ाने चला जाता, यह न जाने किस-किस से बात करती रहती थी। एक बार रमुआ ने मुझसे कहा भी था कि भाभी हरिया ड्राइवर से ज्यादा मेल-जोल रख रही है, शायद मोबाईल से बात भी करती है। काश, तभी मैं संभल गया होता, उस पर लगाम कसा होता तो आज यह नौबत न आयी होती। मैंने इसकी ओर से सफाई देते हुए रमुआ को खूब डांटा था। तब मैं न जानता था यह इतनी बदचलन और बेहया निकलेगी। मेरे सामने तो ऐसे रहती थी मानो कहीं की सती-सावित्री हो। गलती मेरी ही थी, देखकर भी नजर अंदाज करता रहा। उसके रूप पर जो फिदा हो गया था।

एकाएक विचारों ने पलटा खाया। उसने आंसुओं को पोंछ लिया। मैं किसके लिए रो रहा हूं, एक नामुराद, बदजात, बदचलन, बेवफा औरत के लिए, जिसे अपने पति और बच्चों की जरा भी परवाह नहीं। जो एक पत्र छोड़ आधी रात को चोरों की तरह अपने आशिक के साथ भाग गयी। बीच-बीच में गुस्सा इतना आता कि इस समय वह सामने आ जाये तो उसका और हरिया ड्राइवर दोनों का खून कर देता। चाहे उसे फांसी ही क्यों न हो जाती। ऐसा लगता था कलेजा मुंह को निकल आएगा। उसने अपने पतलुन की जेब से वह चिट्ठी निकाली और एक बार पुनः पढ़ा। सुबह से इस पत्र को पचासों बार पढ़ चुका है। एक बार तो मन में आया की उस पत्र को जला दे, किन्तु कुछ सोचकर पुनः जेब में रख दिया। वह समझती है कि जिसके साथ वह भागी है, वह उसका जीवन पार लगाएगा, तो वह धोखे में है। महीना दो महीना बाद ही वह ठुकरा देगा, तब कहीं की न रह जाएगी। यहां का दरवाजा अब उसके लिए हमेशा बंद है। कई दिनों से उसका चाल-चलन देख रहा था। छुप-छुप के बातें करते भी देखा था। पूछने पर कहती कि अपने गांव बात कर रही हूं। मुझे क्या पता था कि उसके मन मे ऐसे पाप पल रहे हैं। अभी तक तो इस बात को कोई नहीं जानता, किन्तु जब यहां सबको पता चलेगा तो कितनी बदनामी होगी। अपने गांव में घर वालों को या पड़ोसियों को यह खबर मिलेगी तो कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाऊंगा। मां-बाबूजी अलग बोलेंगे कि यहां से झगड़कर साथ ले गया। अपने घर का काम कौन नहीं करता है? वह भी उसे पहाड़ लग रहा था। वह तो कहती ही थी, तुम भी उसी का पक्ष लेकर वहां परदेश लेकर गये। नाक कट गयी तो अब भुगतो। आज तक गांव-घर में ऐसा न देखा, न सुना। गांव वालों को इस कलंक का पता चलेगा तो ताने मार-मारकर जीना मुश्किल कर देंगे।

उसने रोटी बनाकर दूध के साथ बच्चों को खिला दिया। बच्चे भूखे थे, खा तो लिया, पर जब पेट भर गया तो मां के लिए रोने लगे। रामस्वरूप ने चुप कराने का लाख प्रयत्न किया, किन्तु जब अंकुर चुप न हुआ तो डांटकर गुस्से में आंगन में बिठाकर अलग हो गया। पूजा भाई को चुप कराने का असफल प्रयास कर रही थी। खुद भी रोती और भाई को चुप कराती। यह डर भी था कि बच्चों की रोने की आवाज सुनकर कहीं कोई पड़ोसन न आ जाये और अनुराधा के बारे में पूछने न लग जाये। इसलिए उन्हें कमरे के अंदर ले जाकर खिलौने और मिठाइयां देकर चुप करा दिया। इन नन्हें बच्चों को छोड़कर स्कूल भी न जा सकूंगा। क्यों न मां-बाबूजी को इसकी सूचना दे दूं। किन्तु नहीं, उन्हें इस मुसीबत में क्यों घसीटूं, उन्हें कितना दुःख होगा। वे दोनों पहले जी भर के मुझे कोसेंगे, फिर चारों तरफ हल्ला मचा देंगे। चारों तरफ थू-थू होगी, कितनी जग हंसाई होगी, कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाऊंगा। मान लिया न भी कोसेंगे, मेरे साथ सहानुभूति ही करेंगे तो किस मुंह से उनसे यह कहूंगा। इज्जत लौटने से रही, अनुराधा आने से रही। फिर ख्याल आया कि कहीं मकान मालकिन आ गयी और पूछने लगी तो क्या बताऊंगा या स्कूल से ही कोई हाल लेने न आ जाये तो? क्यों न किसी के हाथ चार-पांच दिन की छुट्टी ही लिख भेजूं? यह सोचकर बीमारी का बहाना कर, पांच दिनों की छुट्टी की अर्जी लिखकर पड़ोस में एक छात्र के हाथ में दे आया। घर आकर बाहर का दरवाजा बंद करके अपने मोबाइल से कुछ नंबर निकालकर मिलाने लगा।

वही बच्चे जिनकी किलकारियों, हंसी, बालपन की ठिठोलियों से, भाग-दौड़ तथा खेलने, रोने-गाने, चिल्लाने से सारा घर गूंजा करता, वहीं अब सन्नाटा पसरा रहता। मानों आने वाली दुःखद परिस्थितियों का आगाज करा रहा है। जैसे घर में कोई है ही नहीं। केवल रोने और सिसकने की आवाजें आतीं। कभी बेफिक्री, उन्मादित, हर्षोल्लासित और प्रफुल्लित रहने वाले बच्चे अब उदास, निराश और हताश चुपचाप बैठे रहते हैं। कभी थोड़े समय के लिए हंसने और खेलने भी लगते हैं, किन्तु कुछ देर बाद पुनः अम्मा-अम्मा की रट लगाने लगते। उनकी इस दुरावस्था को देख भला किसके हृदय पर आरे न चलेंगे, किसके चक्षु नम न हो जाएंगे। रामस्वरूप तो फिर भी उनका पिता है। वह कैसे इन परिस्थितियों का सामना कर रहा है, इन दो दिनों से कितना मानसिक और शारीरिक कष्ट झेल रहा है, यह वही जानता है। इन दिनों वह कितना अकेला, कितना दुःखी, कितना लाचार और बेबस है। यह अनकही पीड़ा ज्वाला बनकर अन्दर ही अन्दर उसे जलाए और गलाए जा रही है। उसे अपनी फिक्र न थी, बच्चों की चिंता थी, उनके भविष्य की चिंता थी। उनके दुःख, व्यथा, कुसेवा और अकेलेपन से वह तड़प उठता।

आज तीन दिन हो गये। रामस्वरूप पिता से माता बन गये हैं। उनकी हर एक आवश्यकताओं का ख्याल रखते। उनको नहलाते, कपड़ा धोते, समय पर खाना खिलाते। अब उन्हें आभास होने लगा था कि माता के कर्त्तव्यों का निर्वाह करना सहज नहीं हैं। बच्चों का पालन करना तपस्या करने से भी ज्यादा कठिन काम है। इतना करने पर भी जब वे माता की रट लगाते तो उन्हें गुस्सा आ जाता, वह क्रोधित हो जाते, बालकों को कोसने लगते। इन अभागों की किस्मत में माता का प्यार नहीं लिखा है तो कोई क्या करे? फिर अनुराधा पर गुस्सा निकालते, वह क्या समझती है कि उसके बिना मैं और बच्चे मर जाएंगे। चाहूं तो आज विवाह कर लूं। मेरी हामी भरने की देरी है, किन्तु मैं उसकी तरह बेहया नहीं। पता नहीं क्या देखकर ट्रक ड्राइवर के साथ भागी। मान-अपमान, इज्जत-प्रतिष्ठा का जरा भी ख्याल नहीं किया। वह तो निठल्ला था, इसकी तो अपनी घर-गृहस्थी थी, दो-दो बच्चे थे। इसका कारण मैं ही हूं। मुझे सुन्दर स्त्री चाहिए थी। काली-कलूटी होती तो यह दिन न देखना पड़ता। जिसकी कभी मैं सुंदरता की तारीफ करते नहीं थकता था, सारे नखरे उठाता था, वही नाक कटा गयी। सुन्दर स्त्री इतना बेवफा क्यों होती है? ईश्वर किसी को सुन्दर पत्नी न दे।

इधर-उधर बहुत नम्बर लगाने के बाद तीसरे दिन शाम तक एक नम्बर मिला जिस पर फोन करने पर उधर से जो आवाज आयी, रामस्वरूप उसे पहचान गया। बोला, “इस वक्त तुम कहां और किसके साथ हो, इस तरह आधी रात को चोरों की तरह क्यों भाग गयी?”

उधर से आवाज आयी, “ये तो मैं न बता पाऊंगी।”

“कब आ रही हो?”

“आना होता तो भागती क्यों?”

रामस्वरूप अधीर होकर बोले, “मेरी न सही, क्या तुम्हें बच्चों की भी याद नहीं आती? देखो, माता-माता कहकर कब से पुकार रहे हैं। तीन ही दिन में इनके चेहरे बेरंग हो गये, अनाथों सी हालत हो गयी है। इनकी खुशियां, बालपन, यहां तक की नींद भी उड़ गयी है। ये नींद में भी तुम्हें ही बुलाते हैं।”

“वो मेरे नहीं, आपके बच्चे हैं। आप उन्हें सम्भालो। मुझे अपना जीवन जीने दो। मैं बहुत खुश हूं।”

“इतना कठोर मत बनो अनुराधा। मेरा न सही, इन मासूम बच्चों का ध्यान करो। जिनको देखे बिना तुम एक दिन न रह पाती थी, जिनकी जुदाई असहनीय थी, जिनकी जरा सी पीड़ा तुमसे बर्दाश्त न होती थी, उन्हें इस तरह छोड़ भागीं? वो भी अधम वासना के लिए। सोचो, कितनी बदनामी और बदगुमानी होगी।”

“यह सब बहुत पहले ही सोच लिया था।”

“यह तो बता दो भागी क्यों? तुम्हें मुझमें क्या कमी नजर आयी? इतना बड़ा कदम उठा लिया, मुझे भनक तक न लगी।”

“अगर यही जानना चाहते है तो सुनिये, मेरा दिल हरि पर आ गया, अब क्यों, कब और कैसे आ गया, क्या कारण था, क्या देखकर आ गया? यह तो मैं भी नहीं जानती। सुना था प्रेम उम्र, ऊंच-नीच, जात-पात, अमीरी-गरीबी देखकर नहीं होता। अब प्रत्यक्ष कर रही हूं। इनकी जाति, पेशा और रूप से मुझे कुछ मतलब नहीं, यह आत्माओं का मिलन है। मैं नहीं जानती शादी-शुदा और बच्चों वाली होने के बाद भी कैसे मेरा दिल इन पर आ गया। ये भी मुझसे बेपनाह प्यार करते हैं। शायद हम पहले जन्म के प्रेमी रहे होंगे। हमारे इस मिलन के बीच कोई भी आये यह मुझे पसंद नहीं। यदि तुमने मेरे खिलाफ कोई केस बनाया तो मैं भूल जाऊंगी कि तुम मेरे पति थे और मैं तुम्हीं पर प्रताड़ना, दहेज और ऐसे ही हजारों केस बनाकर तुम्हें और तुम्हारे घरवालों को फंसा दूंगी। अब कुछ मत पूछना, ना कभी फोन करना। मुझे मेरा जीवन जीने दो।” यह कहकर कॉल कट कर दी।

रामस्वरूप को जीवन में इतनी निराशा और हताशा कभी न हुई थी। इतना बड़ा नीच, अधम कृत्य करने के बाद भी कितनी सफाई और निर्भीकता से बात कर रही है। उसकी बातों में जरा भी लज्जा और वेदना का अंश नहीं है, जैसे कोई सुकर्म और प्रशंसनीय काम किया हो। वह क्रोध और निराशा के उस पराकाष्ठा तक पहुंच गये थे, जहां से जीवन की रेखा पतली होकर क्षीण हो जाती है। उन्हें अभी विश्वास था कि ये शब्द उसके अपने नहीं थे। वह दबाव में या क्षणिक वासना और प्रेम के बहाव में अथवा बहकावे या सिखावे में ऐसा कह रही है। नारी का यह रूप उसने पहले कभी नहीं देखा था। अब तक उसे एक विश्वास, एक आस, अंतःमन के किसी कोने में उम्मीद की एक चिंगारी जला रखी थी, किन्तु अनुराधा के इन कटु, शुष्क, निष्ठूर वचनों की आंधी ने उसके हृदय में जलती उस चिंगारी को भी बुझा दिया। वह उस जगह पर खड़ा था, जहां इस घटना के बारे में किसी को बताते शर्म आती है, इज्जत और प्रतिष्ठा दांव पर लग जाती है। किन्तु वह छुपा भी कितने दिन सकेगा? प्रसूति का पेट भी कहीं छिपता है?

रात के दस बज रहे हैं। दोनों बच्चें अम्मा-अम्मा की रट लगाये अभी-अभी सोये हैं। उनके कपोल आंसुओं से अभी भी गीले हैं। कभी-कभी अचानक नींद से उठकर अम्मा-अम्मा पुकारने लगते हैं, मानों स्वप्न में या स्मृतियों में माता का दर्शन हुआ हो, किन्तु उन्हें न पाकर रोते हुए निराशा में पुनः सो जाते हैं। तीन ही दिन में बच्चों का सुकोमल, प्रफुल्लित शरीर कुम्भला गया है। मां के वियोग ने उनके चेहरे की रंगत और शरीर की स्फूर्ति को छीन सा लिया है। कुछ देर के लिए भूलकर खेलने लगते हैं, किन्तु थोड़ी देर बाद ही अम्मा-अम्मा की रट लगाने लगते हैं। वह उन्हें सारी चीजें देते, उनकी हर एक आवश्यकताओं का ख्याल रखते जो अनुराधा उन्हें देती थी, किन्तु न जाने वह कौन सी कमी रह जाती कि वे उसकी रट लगाये ही रहते। उन्होंने सोचा कि एक-दो दिन में माता को भूल जाएंगे, परन्तु अनुराधा के प्रति उनका विरह और तड़प बढ़ता ही जा रहा था। उसे पाने की उत्कंठा और व्याग्रता तेज होती जा रही थी। हताशा और निराशा ने उनकी हालत खराब कर दी थी।

रामस्वरूप कुर्सी पर बैठे चिंता के अथाह सागर में डूबकी लगा रहे हैं। तीन दिन से भोजन का एक कौर भी गले से नीचे नहीं उतारा है। न घर से निकलते, न कहीं आते-जाते, न किसी को अपने यहां आने देते। सारा दिन दरवाजा बंद कर घर के अंदर ही रहते। खुद के नहाने, खाने की सुध तक नहीं रहती। उसी तरह मैले कपड़ों में पड़े रहते। अब तो अब तो चलने में भी कमजोरी का आभास होता था। तीन ही दिन में पहचान में नहीं आते थे। बच्चे बाहर जाकर दूसरे बच्चों के साथ खेलते या दूसरे बच्चे ही यहां आते तो उनका मन बहल जाता, किन्तु ऐसी परिस्थिति में भेद खुलने का डर था। तीन रात में दो तीन घंटे से अधिक कभी न सो पाया। सोते ही अजीब-अजीब सपने आने लगते और वह जाग जाता। अब तक तो वह किसी तरह इस बात को छुपाये हुये था। उसे उम्मीद थी कि अनुराधा आयेगी, वह इतना निष्ठूर नहीं हो सकती। शादी के सात फेरे, वो कसमें, वो वादे, साथ बिताए स्मृतियों को किसी भी हालत में वह विस्मृत नहीं कर पाएगी। किन्तु फोन से जो बात हुई उससे साफ हो गया कि अब वह लौट के आने की दशा में नहीं है। पहले तो उसने सोचा था कि वह आएगी तो सबक सिखाऊंगा, डांटूंगा, मारूंगा, रौब जमाऊंगा और भगा दूंगा। किन्तु जैसे-जैसे उसके आने में देर होता और दिन बीतता जाता उसका यह अभिमान चिंदी होता जाता। अब नौबत यह आ गयी थी कि उसे बुलाने के लिए वह उसके पैरों पर गिरने को तैयार था। इसके लिए दोबारा उसने फोन भी किया था। उसने बहुत मिन्नतें कीं, रोया, गिड़गिडाया, किन्तु प्रेम में अंधी अनुराधा ने उसकी एक नहीं सुनी और दोबारा फोन करने पर पुलिस की धमकी भी दी। एक बार इसके मन में आया कि नहीं आती हो मेरी बला से, अब मैं तुम्हें बुलाने भी नहीं जाऊंगा। दूसरी शादी कर लूंगा। फिर मेरे पास तो सरकारी नौकरी है, जब चाहूं तुमसे से अच्छी पत्नी ला सकता हूं। किन्तु विचारों ने तुरन्त पलटा खाया। यहां और गांव में जो बदनामी होगी उसका क्या करुंगा? शिक्षक की नौकरी, कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहूंगा। घर वाले ऊपर से ताने देंगे। अब वह समझ गया था कि स्त्री चाहे तो पलभर में पुरुष को जलील कर सकती है, उसकी और उसके खानदान की इज्जत को तार-तार कर सकती है। बार-बार उसकी सोच यहीं आकर ठहर जाती कि बदनामी के इस कलंक से तो मौत अच्छी है। एक ही बार पीड़ा होगी, जीवन भर का कलंक तो न ढोना पड़ेगा, लोगों के जहरीले और हृदयभेदी तानों को न सुनना पड़ेगा। अकथ, असहनीय पीड़ा तो न सहनी पड़ेगी।

वह इन्हीं ख्यालों में खोया था कि पूजा अम्मा-अम्मा करते हुए बांहे फैलाए उठ बैठी। बिजली जल रही थी। कुर्सी से उठकर लाला ने उसे गोद में उठा लिया और प्यार से गले लगाकर पूछा, “क्या हुआ बेटा? कोई सपना देख रही थी?”

बच्ची खुशी में बोली, “अभी अम्मा आयी थी, उन्होंने हाथों में चाकलेट छुपाई हुई थी। एक अंकुर को दी, मुझे देने के लिए बुलाया, मैं दौड़कर गई, किन्तु न जाने वह कहां छुप गयी। कहां है पापा, बताओ न? मुझे अम्मा के पास ले चलो पापा।” यह कहती हुई रोने लगी। रामस्वरूप ने भीगे नयनों से उसे सीने से चिपका लिया।

पूजा फिर बोली, “सुबह अम्मा आएगी न पापा?”

“हां बेटा।”

“चाकलेट लाएगी न?”

“हां, लाएगी।”

उस समय उसे ऐसा लग रहा था कि वो अपना कलेजा निकालकर रख दे। इन बच्चों की खुशी के लिए जो उसे प्राणों से बढ़कर थे, क्या कुछ न कर जाता। अपने शरीर के रक्त की एक-एक बूंद से यदि इन बच्चों की एक पल की खुशियां मोल मिल जाए तो वह कदाचित पीछे न हटता। अपने को दुनिया का सबसे भाग्यवान व्यक्ति समझता। बच्चों का दुःख अब और नहीं देखा जाता। उनकी मूक और प्रगल्भ वेदनाएं उसकी सहन शक्ति की सीमा को पार करती जा रही थीं। उसकी आत्मा के टूकड़े हो रहे थे, हृदय-विदीर्ण हो रहा था। बच्चों की पीड़ा का अनुभव वास्तव में शरीर को कंपा देने वाला, मन और आत्मा को झकझोर देने वाला था। कुछ देर बाद वह उसी तरह कंधे पर सो गयी। उस मासूम को क्या पता कि आज की रात नियति ने उनके साथ कुछ और ही सोच रखा था।

सुबह आठ बजे दूधवाला आया। उसके कई बार आवाज लगाये जाने और दरवाजा पीटने पर जब न कोई जवाब आया और न दरवाजा खुला तो आस-पड़ोस से भी कई लोग आ गये। काफी आवाज लगाने के बाद भी जब दरवाजा न खुला तो किसी अनहोनी की आशंका से किवाड़ के पल्ले निकाल दिये गये। घर के अंदर का दृश्य बेहद दर्दनाक और दिल को दहला देने वाला था। दोनों मासूम बच्चे पंखे की रस्सी से लटक रहे थे। दूसरे कमरे के पंखे से रामस्वरूप लटक रहा था। यह दारूण दृश्य देख कुछ औरतें मूर्छित होकर गिर पड़ीं। किसी पडोसी ने पुलिस को भी खबर कर दी थी। सभी के मन में यही सवाल था कि इतने सुन्दर, कोमल, मासूम, दूध पीते, फूल से बच्चों को एक पिता कैसे फांसी के फंदों पर लटका सकता है? वो भी अपने ही हाथों से। वही पिता जो उनकी एक खुशी के लिए धरती के अंतिम छोर तक दौड़ लगाने को तैयार रहता था, जो उनकी जरा सी खरोंच पर बिलख जाता था, वे कभी गिरते तो कलेजा मुंह को आ जाता। उनके सुकोमल, नाजुक गर्दन को फांसी के फंदे में कैसे डाल सकता है? इन नवजातों के गले में रस्सी डालते समय हाथ न कांपे होंगे, दिल में हुक न उठी होगी? जिन्हें गोद में लेने को बांहें फैलाये रहता, जिनकी तोतली बोली में पापा शब्द सुनने के लिए कान उतावले रहते, उन्हीं हाथों में इतनी हिम्मत कहां से आ गयी? आंखें कैसे इस करूण दृश्य को देख पायी, कान कैसे अंतर्नाद ध्वनि सुनकर भी खामोश बने रहे कि उन्हें यमराज की गोद तक पहुंचा दिया। लटकाते समय बच्चों के दर्द, चीख और वेदना को कैसे सहन कर पाया होगा? उसकी आंखें अंतिम छवि कैसे देख पायी होगी? दिल को इतना कठोर, निर्मम, निर्दयी और क्रूर कैसे बनाया होगा?

रामस्वरूप की कमीज से मिले पत्र से सारा भेद उजागर हो गया। पत्र में लिखा था, “इन चार दिनों में मैं चालीस बार मरा हूं। प्रेमी का प्रेम और वासना अंधा होता है, यह तो जानता था, किन्तु इस कदर अंधा होगा कि वात्सल्य, ममत्व जैसे महान शब्दों को ठोकर मार दे, संतान के अनमोल प्यार को अनदेखा कर दे, पुत्र-प्रेम जैसे अनमोल रिश्ते का तिरस्कार कर दे, यह पहली बार ही देख रहा हूं। कैसे अपने कलेजे को कठोर करके, फूल जैसे अबोध, नाजुक, दूध मुंहे बच्चे को छोड़कर भाग गयी? इतने दिन साथ रहने के बाद भी पति से नाता कैसे तोड़ गयी? अपने दिल के टूकड़े को, जिसे नौ महीने अपना रक्त पिलाकर पालती रही, कष्ट सहती रही, दर्द से बिलखती रही, उसे क्यों छोड़ भागी? उसके पांव कैसे घर की दहलीज लांघे होंगे? वह मासूम चेहरा जिसकी हर एक अदा पर पत्थर दिल भी पिघल जाए, क्रूर से क्रूर व्यक्ति भी जिसकी मासूमियत के आगे नतमस्तक हो जाए, उनकी तोतली बोली, विनोद और मासूमियत से भरे उनके कारनामे भी उसकी पांवों की बेड़ियां न बन सके? एक बार भी उन बच्चों के भविष्य के बारे में न सोचा। एक गैर मर्द के साथ भाग जाने का जो आजीवन कलंक मेरे दामन पर लगा गई, वो शायद इस जन्म में तो नहीं धूल सकता। मैं भी किसी का बेटा, किसी की आंखों का तारा और दुलारा हूं। मेरे बूढ़े माता-पिता पर क्या गुजरेगी? वे कैसे, किसके सहारे जीवन गुजारेंगे? बुढ़ापे में कौन उनको सहारा देगा? एक शिक्षक होने के नाते समाज में मेरी बहुत इज्जत है। माता-पिता के प्रति भी मुझे अपनी जिम्मेदारियों का अच्छी तरह से अहसास है, किन्तु बच्चों की बेबसी, लाचारी और समाज से मिलने वाले तानों का डर मुझ पर हावी हो गया है। किस-किस के सवालों के जवाब देता रहूंगा। बहुत सोच विचार के बाद ही मैं अपनी जीवनलीला समाप्त कर रहा हूं। मेरे न रहने पर इन अबोध बच्चों का क्या होगा, यह सोचकर इनको भी अपने साथ लिए जा रहा हूं। एक मजबूर और बेबस पिता के द्वारा किये गए इस घृणित कृत्य के लिए मुझे माफ कर देना।” रामसवरूप द्वारा अंतिम समय में लिखे गए इस पत्र को जिसने भी पढ़ा, उसकी आंखें स्वतः ही नम हो गई।

यह सच है कि आदमी अपनों से लड़ लेता है, परायों से लड़ लेता है, किन्तु जहां इज्जत की बात आती है, वह चारों चित पटकनी खा जाता है। दुनिया क्या कहेगी, समाज क्या सोचेगा? वह उस समाज की परवाह करता है, जो उसे भूखे और नंगे देखकर मुंह फेर लेता है। जो पथों के किनारे भूख से बिलखते, मरते देखकर बिना परवाह किये अपने रास्ते चला जाता है। जो सड़क या स्टेशन पर किसी वस्त्रविहिन या चिथड़ों में लिपटी स्त्री, दरिद्र को देखकर रास्ता बदल लेता है या नजरें घूमाकर तेजी से निकल जाता है। उस समाज के ताड़ना और प्रताड़ना के डर से आदमी कितना बड़ा अनर्थ कर देता है। पिता तो वह है जो अपनी संतान के लिए सारी दुनिया से लड़ जाता है। दुनिया की बदनामी के डर से मासूमों के साथ फांसी पर नहीं लटकता। एक बदचलन स्त्री के कुकर्मों का दण्ड इन निरपराध मासूमों को देना कहां का न्याय है? बच्चों के सहारे वो अपनी जिंदगी काट सकता था। जिस समाज के तिरस्कार के डर से वह यह अधम कर्म कर गया, वह कुछ दिनों में इस बात को भूल जाता। उसने जो किया वह कायरता है, लेकिन जो हो चुका था वो वापिस आने वाला नहीं था।