ISSN NO: 2581-8074 मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान की अन्तर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका (Multidisciplinary) Peer Reviewed Journal

बचपन की सुनहरी यादों का जीवंत दस्तावेज: ‘बाली उमर’

बिश्वजीत कलता
समीक्षा

भगवंत अनमोल (30.अगस्त.1990 ई) युवा लेखक अपने लेखन में सामाजिक रूप से संवेदनशील विषयों को उठाते हैं। उन्होंने दो प्रेरक पुस्तकें ‘कामयाबी के अनमोल रहस्य’ ‘तुम्हे जीतना ही होगा’ और चार उपन्यास लिखें हैं। जिसमें ‘एक रिश्ता बेनाम सा’, ‘जिंदगी 50-50’, ‘बाली उमर’ और ‘प्रमेय’। उनकी पुस्तक ‘जिंदगी 50-50’ किन्नर जीवन की अनेक पहलुओं को हमारे सामने रखती है। यह उपन्यास एक ओर जहाँ दैनिक जागरण नेल्सन वेस्ट सेलर लिस्ट में कई बार शामिल रहा, वहीँ उसे उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा बालकृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार से भी अलंकृत किया गया। 2021ई. में अनमोल जी का नया उपन्यास ‘प्रमेय’ हिंदी साहित्य में कथ्य और शिल्प की दृष्टि से नवीन प्रयास था। यह विज्ञान, फिक्सन, धर्म और अध्यात्म को एक ही धागे में पिरो कर लिखा गया है। इस उपन्यास के लिए भगवंत अनमोल को ‘साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार’ से 2022ई. में सम्मानित किया गया है। लेखन क्रम में उन्होंने ‘बाली उमर'(2019ई.) नाम का उपन्यास लिखा जो सामाजिक रूप से संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय ‘बचपन और गांव’ के परिदृश्य के उपर है। बढ़ती आधुनिकता और शहरीकरण के चलते बच्चों से उनका बचपन छीना जा रहा है। एक बच्चे को जल्दी से जल्दी परिपक्व बनाया जाए उसी होड़ में आज के ‘न्यूक्लियर फेमेली’ के अभिभावक लगे हुए हैं। कोई बच्चा दस साल का हुआ भी नहीं कि उसे नीट, यूपीएससी, जेई आदि परीक्षा की भीड़ में शामिल कर उसकी अल्हडता और बचपन को तिलांजलि दे दी जा रही है। इसी बालपन, गांव और ग्रामीण परिवेश को एक बार फिर अनमोल जी ने इस उपन्यास के माध्यम से उठाया है।

उपन्यास का पहला अध्याय जिसे भूमिका भी कहा जा सकता है, वहाँ पर अनमोल जी इस उपन्यास के उद्देश्यों को स्पष्ट लिखते हैं –“यह कहानी है, उत्तर भारत के गांवों के हर उस बच्चे की जिसने अपना बचपन गांव में जिया है। हो सकता है, आपने भी ऐसा जीवन जिया हो, हो सकता है न जिया हो, आप शहर में जन्मे हो और वहीं पले बड़े हों। लेकिन अगर आपने गांव का जीवन जिया है तो आपको मैं आसपास के उन किरदारों के पास ले चलता हूँ, जो कभी आपकी जिंदगी का अभिन्न अंग थे, आपको उस दौर की सुनहरी यादों में ले चलता हूँ, जिसे पीछे छोड़ अब शहर चले आए। लेकिन अगर आपने गांव का जीवन नहीं देखा है तो आपको मोबाइल, टेलीफोन और टीवी से कोशों दूर उस मोहल्ले में ले चलता हूँ, जहाँ के ये ऐसे नायक हैं जो जीरो से हीरो बन गए। फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम जब इन तमाम माध्यमों का जन्म ही नहीं हुआ था। उस दौर में पहुँच कर आपको कुछ वैसा ही महसूस होगा जैसे शहर के शोर शराबे से दूर किसी हिल स्टेशन की सैर करना। तो आइये आपको मिलाता हूँ बाली उमर के उन पांच नायकों से मेरी स्मृति में जिनकी छवि जीरो से हीरो बनने की है।”

लेखक का उद्देश्य स्पष्ट है कि ये उपन्यास आज कल के बच्चें जो इंस्टाग्राम, फेसबुक, वीडियो गेम में ही अपने बचपन को कैद कर लेते हैं उनके लिए और उस वर्ग के लिए है, जिनका बचपन गांव में तो बीता है पर नौकरी या एक बेहतर जिंदगी की तलाश में शहर आ गए। उन्होनें इस उपन्यास में दिखाया है कि बचपन और गांव क्या होते हैं।

बाली उमर उपन्यास गांव के बच्चों की एक ऐसी कहानी हैं जो 1980ई. से 2000ई. के बीच उत्तर भारत के हर गांव के बच्चों की कहानी का प्रतिनिधित्व करती है। लेखक ने इस उपन्यास में पांच बच्चों को पात्रों के रूप में उठाया है जिन्हें वे अपना नायक भी कहते हैं। वे पांच चरित्र है- ‘पोस्टमैन’, ‘खबरीलाल’, ‘गद्हा’, ‘आशिक’ और ‘पागल है’। ये बच्चे हर उस व्यक्ति को अपनी स्मृतियों से जोड़ते हैं जो कभी किसी गांव या छोटे कस्बे में पले बढ़े थे। इन पांच पात्रों से आइये आपका परिचय करवा दूँ।

सबसे पहले आता है पोस्टमैन, जिसका नाम बंटी है। वह प्रेमी प्रेमिकाओं का खत पहुंचाने का काम करता है इसलिए उसे पोस्टमैन के नाम से पुकारा जाता है। वह कुछ बख्शीश लेकर अपने से बड़े लोगों के प्रेम पत्र उनकी प्रेमिकाओं तक पहुंचा देता था। वह आधे रास्ते में इन प्रेम पत्रों को खोलकर पढ़ लेता था और उससे उसे जो नवीन ज्ञान प्राप्त होता था उसी से अपने दोस्तों के आगे अपने आप को सबसे चालाक और तीसमार खाँ समझता था।

दूसरा है खबरीलाल। उसका असली नाम पेट्टर था। उसके पिता दूध बेचते थे, पर वह गांव के हर घर में दूध पहुंचाने का काम करता था। इससे उसे अपने गली-मोहल्ले की हर चीज़ की खबर रहती थी। वो अपने साथियों को ताजातरीन खबरों और नवीन प्रसंगों से परिचित करवाता था।

तीसरा है गद्हा, इसका असली नाम रिंकू था। यह फौजी का बेटा था। वह अपने मित्रों से यानी पोस्टमैन और खबरीलाल से एक कक्षा पीछे पढता था। वह पढ़ने में इतना कमजोर था कि उसे उसके दोस्त गद्हा बुलाते थे। वह अजब-गज़ब सवाल पूछता था और अजीबो गरीब हरकतें भी करता था।

चौथा पात्र आशिक, अनमोल जी इस का परिचय इस प्रकार देते हैं “हर मोहल्ले में एक ऐसा बच्चा जरूर होता है जो बचपन से ही आशिकी गिरी को बखूबी संभाल लेता है।” आशिक का नाम झंडीलाल था। वह गांव के उम्मीदवार प्रधान का लड़का था। वह अपनी कक्षा में मयूरी नाम की लड़की से प्रेम करता था। इसी के चलते उसका नाम आशिक रखा गया है।

‘पागल है’ पांचवा पात्र , जिसका मूल नाम शायद गोविन्द था। वह कर्नाटक का एक लड़का था, जिसे उसके चाचा ने बेहोश कर ट्रक में डाल दिया और ट्रक वाले ने उसे नवाबगंज के दौलतपुरा गांव में छोड़ दिया। उसके लिए हिंदी बोलना और समझना बहुत दुष्कर था। गांव वाले उसकी भाषा समझ नहीं पाती थे इसलिए उसे पागल घोषित कर दिया गया था। इस गांव में उसे जीवन व्यतीत करने में कठिन संघर्ष करना पड़ा। अंत में उन चारों दोस्तों की मदद से उसे अपने घर वापस भेज दिया जाता है।

इसके अलावा ‘बम्बईया’ नाम का एक लड़का गर्मी की छुट्टी में गांव आया था, जो कन्नड़ भी जानता था। उसी ने चार प्रमुख चरित्रों के साथ पागल का संवाद स्थापित किया और उनसे पागल की दोस्ती हो पाई।

उपन्यास की कथा मूलत: नवाबगंज नाम के गांव के दौलतपुरा मोहल्ले और उसमें रहने वाले वहाँ के वाशिंदे की है। इस उपन्यास में बाली उम्र के दौर से गुजर रहे उपरोक्त पांच बच्चों की जिन्हें उनके स्वभाव, अभ्यास, आदतों के अनुकूल नाम दे दिया गया है जो अक्सर गांव में दे दिया जाता है। वे हैं आशिक, खबरीलाल, गदहा, पोस्टमैन और पागल है।

उपन्यास का आरम्भ इन पांच बच्चों की उत्सुकता, नादानी, शरारतों और कार्यकलापों से किया है। जिसे इस प्रकार व्यक्त किया है कि हर पाठक को एक बार उसका बचपन जरूर याद आ जाएगा। चाहे वह पोस्टमैन के स्कूल की कारनामे हो जैसे- वह कैसे साग और अमरूद के माध्यम से मास्टर साहब को उल्लू बनाया था। या चाहे वो स्कूल में हर एक नई लड़की को देख कर एक तरफा प्रेम में पड़ जाना और प्रेम पाने के लिए प्रेमपत्र से लेकर वशीकरण मंत्र तक का उपयोग करना। इसके अलावा बच्चो में सबसे ताकतवर हीरो चुनना, बारात में ठंडई पीना, पड़ोस के यहाँ कोई लड़की आई हो तो उसे इम्प्रेश करना आदि ऐसे कई प्रसंग है जिसे पढ के दुबारा आपको अपना बचपन याद आ जाएगा।

कहानी में हास्य और रोचकता के साथ बच्चों की जिज्ञासा और अनभिज्ञता का भी परिचय देखने को मिलता है। जैसे- अजब तर्कों के जरिये पृथ्वी को गोल नहीं बल्कि चपटा करार दिया जाना, तो कहीँ ब्याह के बाद क्या होता है इस पर बातें करना पाप समझा जाता है। तो बच्चे टेलर की दुल्हन का लेग पीस छप्परों से झांककर देखने का प्रसंग। या फिर गांव में जब नाटक खेला जाता है उसी समय में प्रेमी युगल के करतब को सबके सामने प्रगटित करना आदि प्रसंगो से हसीँ रूकने का नाम नहीं लेती है।

मगर धीरे-धीरे उपन्यास की कहानी गंभीरता की ओर बढ़ने लगती है। कथानक हास्य व्यंग्य के बदले पाठक की मर्म को छूती हुई दिखाई देती है। कथ्य में क्लाइमैक्स आता है और वह भी उस कन्नड बच्चे (पागल है) के द्वारा। वह अपने चरित्र के माध्यम से पाठक को भावूक बना देता है। पूरे गांव वाले उसकी भाषा को न समझकर उसके साथ पागल सा सलूक करते। वह अपने माता पिता से कोसों दूर भूखा प्यासा दिन रात संघर्ष करता है। उसे गांव के लोग खाना देने के बदले मारते थे। वह जीने के लिए मजबुरी में गांव के मुखिया के भैंस भी चराने लगा था। तब भी गांव वाले उसे पागल ही समझते थे। इसी बीच उसे एक लड़की से प्यार हो जाता है या यूं कहें की उसे वो लड़की अच्छी लगती है। तब वह उस लड़की को हमेशा देखता रहता है, हंसता रहता है, अजीबो गरीब हरकतें करने लगता है यह देखकर गांव वाले उसे और मारने लगते हैं। मार-मार कर उसे एक कमरे में बंद कर देते हैं। फिर बॉम्बे से एक लड़का आता है और उसकी भाषा को समझकर उन चार दोस्तों से उसका दोस्ती बनाता है। और अंत में उन चार लड़कों की मदद से उसे वापस अपने घर कर्नाटक भेजा जाता है। एक तरीके से यह उपन्यास का मूल कथ्य भी कहा जा सकता है जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उस बच्चे का संघर्ष और जीने की प्रेरणा देता है जो पाठक वर्ग को सहज ही बांध लेता है। साथ ही भीषण परिस्थितियों में जीवन जी लेने का अवसर न छोड़ने की सीख भी देने का प्रयास इस उपन्यास में दिखाई देता है। इसे पागल है के संघर्षों से देखा जा सकता है‌‌-“ खैर, सुबह हुई। सूरज निकला। उसकी नींद खुली। एक बार फिर से एक नयी सुबह उस के लिए नयी चुनौतियाँ लेकर आई थी। जिंदगी इतनी कम उम्र में ही उसकी कठिन परिक्षा लेना चाहती थी। उसे भूख ने फिर जकड लिया था। उठ पाने में मुश्किल हो रही थी। होंठ सुख गए थे जीव तालू से चिपक सी गयी थी। किसी तरह उसने उठने की कोशिश की।”

शैली और शिल्प के स्तर पर भी ये उपन्यास रोचक लगता है। कहानी के आरम्भ में लेखक अपनी शैली के बारे में लिखते हैं-“ मेरी एक आदत है, कहानी मैं अपनी शैली में सुनाता हूँ, रोचकता बनाए रखने के लिए कहानी को कभी आगे ले जाऊंगा तो कभी पीछे!” कहानी कहीँ कहीँ पर फ्लैशबैक पद्धति में चलती है कुछ घटनाएं जो आगे की है उन्हें बाद में दिखाया जाता है। जैसे ‘पागल है’ के पुर्व जीवन को पिछे दिखाया जाना। लेखक ने जहाँ एक ओर कथ्य को ‘पागल है’ के माध्यम से भावुक और संवेदनात्मक बनाया है, वहीँ दुसरी ओर रोचकता बनाए रखने के लिए हास्य-व्यंग्य शैली का भरपूर उपयोग किया है। जिससे बच्चो को अज्ञानता, नादानी में हँसी का फव्वारा छूट पड़ता है। जैसे- गांव के लोगों को इस वजह से दूरदर्शी बताया जाता है कि वे अपने बच्चों को उनके साइज के नहीं बल्कि बड़े साइज के कपड़े खरीदते हैं, कि उनके बड़े होने पर भी वही कपड़े उनके काम आ सके। तो कहीँ पहली बार किसी शादी में बड़े भोज का आनंद लेने को आतुर गांववाले इसे ‘कुकुर भोज’ का दर्जा देते दिखाई देते हैं। इसी प्रकार कहीँ इन्हें इतना भोला और सरल दिखाया गया है कि बच्चे पैकेट वाले गुब्बारे यानी कन्डोम को लेकर भ्रमित नजर आते हैं कि आखिर यह वस्तु घृणास्पद क्यों मानी जाती है! तो दूसरी ओर अंग्रेजी अध्यापिका से kiss का मतलब जानने के लिए सवाल पूछते दिखाई पड़ना आदि।

जहाँ व्यंग्य की बात है वह गांव की तात्कालिक सामाजिक परिस्थितियों और वहाँ के लोगों के ऊपर कटाक्ष है। जहाँ पर सरकारी नौकरी वाले बिना कुछ रिश्वत लिए कुछ काम नहीँ करते उसे एक पुलिसवालों के माध्य्म से दिखाया गया है। तो मास्टर जी कैसे साग और अमरुद लेकर बच्चों को पास कराते थे इसे भी दिखाया गया है। तो कहीं गांव के राजनीति में दो प्रधान और उनकी आपसी कस्मकस और प्रतिद्वंदिता पर भी कटाक्ष किया गया है।

भाषा के स्तर पर भी यह उपन्यास ठीक लगता है। बहुत सरल और सहज शब्द और वाक्य बनावट है जिससे गांव के पाठक भी रस ले सकते हैं। जैसे कहानी का एक एक वाक्य कितना सहज होते हुए भी कितना चुस्त और रसीले हैं –“अब आशिक ने अपने पिता जी की जेब से पाँच रुपए निकाले और पाँच पैकेट वाले गुब्बारे खरीद लिए। अब वे चल दिए थे गोविंदा की तरह। आज फिर से उसने लाल वाली शर्ट पहनी थी। आज वह पहली बार अपनी प्रेमिका को गिफ़्ट देने वाले थे। पहली बार वे अपनी प्रेमिका को नज़दीक से कुछ देने जाने वाले थे। आज उनकी खुशी को नापने के लिए किसी यन्त्र की ज़रूरत नहीं थी। वह अपने आप टपक रही थी।” जहाँ एक तरफ हास्य है तो दूसरी तरफ भावूकता से भरा एक एक शब्द जो पाठक के मर्मस्थल को छुकर उसे कथ्य में बान्धे रखता है-“ वह भूख और लात-घूंसों की मार खाकर बेहोश पड़ा था। उसे कोई समझने वाला नहीं था क्योंकि उसकी भाषा, उसके वस्त्र पहनने का तरीका भिन्न था। उसके शरीर का रंग भिन्न था। इसलिए उसे एक वक्त की रोटी की जगह लात-घूंसों की मार खानी पड़ी। कहाँ गए थे ईश्वर को पूजने वाले ? कहाँ गए थे हर इन्सान को ईश्वर की औलाद कहने वाले?”

‘गदहा को परम ज्ञान प्राप्ति’ , ‘पोस्टमैन निकला बड़ा खिलाड़ी’ आदि अध्यायों के शीर्षकों के नाम भी मजेदार तरिके से लेखक ने दिए है। इन नामों को सुनने के बाद पाठक उस प्रसंग को पढ़ने के लिए मजबूर हो जाता है। बीच-बीच में लेखक क्रिकेट के संदर्भ में राहुल द्रविड़, सचिन आदि का जिक्र भी पाठक को बांधे रखता है।

निष्कर्षत: अनमोल जी का यह उपन्यास वर्तमान समय के लिए अत्यंत जरूरी है। ग्रामीण परिवेश के पाठक एक बार अपने गांव और बचपन की यादों में फिर डूबेंगे और शहरी परिवेश में पले बढ़े पाठकों के लिए यह उपन्यास तत्कालीन ग्रामीण परिवेश को समझने के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा। शुरुआत में चरित्र और परिवेश को समझने में कुछ समय लग सकता है। परंतु धीरे धीरे उपन्यास पाठक को अपने साथ बांधता चला जाता है। भाषा और संवेदना के स्तर पर भी यह उपन्यास हर पाठक वर्ग को आकर्षित करेगा। 127 पृष्ठ की यह छोटी सी पुस्तक उनके लिए भी है जो भारी भरकम साहित्य, ज्ञान प्रवचन से पक और थक गए हैं और एक सामान्य मनोरंजक कहानी पढ़ना चाहते हैं। आप इसे पढ़कर निराश नहीं होंगे!!

  1. बाली उमर (भगवंत अनमोल), राजपाल प्रकाशन, कश्मीरी गेट, दिल्ली, 2019