यह उपन्यास मूल रूप से बंगला में अद्वैत मल्ल्बर्मन द्वारा लिखे गये उपन्यास “तितास एकटि नदीर नाम” का हिन्दी अनुवाद है. इस शानदार अनुवाद का श्रेय प्रो. चंद्रकला पाण्डेय और जय कौशल को जाता है. समीक्षा से पूर्व इसके अनुवाद के बारे में कुछ लिखना चाहूँगा. पुस्तक में बंगाल लोकगीतों का भी हिंदी अनुवाद कर दिया गया है हालाँकि पाद टिप्पणी के रूप में मूल गीत को भी शामिल किया गया है. अनूदित किये गये लोकगीतों में महज गीत अनूदित होकर आये हैं जबकि उनका ‘लोक’ कहीं खो सा गया है. नए स्वरुप में इन गीतों में न तो प्रवाह है न ही ये गेय है. उन लोकगीतों के लोक का सोंधापन अनुवाद करते ही मर गया है. दूसरी बात यह कि अनुवाद में हिंदी पट्टी और हिंदी पाठको को ध्यान में रखते हुए प्रतीक और बिंब भी कुछ जगहों पर बदल दिए गये हैं. पाठकों तक मूल कथा के संप्रेषण के लिए यह एक शानदार प्रयोग हो सकता है किन्तु इससे मूल पाठ की आत्मा बाधित हुयी है. यद्यपि ऐसा कम ही जगह देखने को मिला है. अनुवादक-द्वय की सर्वथा कोशिश रही है की ज्यादा से ज्यादा हिंदी के समतुल्य शब्दों को जगह दें ताकि संप्रेषण बाधित न हो. खैर!
बंगाल के मालो जातियों की ग़रीबी, भुखमरी, उस भुखमरी में भी उनकी जिजीविषा, तीज-त्यौहार, संस्कार और आत्मीय संबंधो से भरपूर है यह उपन्यास. चूँकि लेखक स्वयं मालो जाति से सम्बन्ध रखते हैं, अपने समाज को उपन्यास से बड़ी बारीकी से जिया है मल्ल्बर्मन जी ने. यह उपन्यास थोड़ी सी ‘क्रिएटिव-फ्रीडम’ लेकर मालो समाज का एक यथार्थ चित्र खींचता है. उसने अपने अपनों को बचपन में ही भूख और ग़रीबी से दम तोड़ते हुए देखा था. ठीक वैसे ही जैसे उपन्यास का पात्र गौरांग. गौरांग का परिवार कुछ इस तरह वर्णित है मानो लेखक स्वयं आँखों देखा यथार्थ रच रहा हो. फिल्मकार ‘ऋत्विक घटक’ ने इस उपन्यास पर फिल्म बनाते समय लिखा था’ “तितास पूर्वी बंगाल का एक खंड चित्र, एक चलायमान जीवन का सशक्त वर्णन है. पूरे बंगाल में (पूर्वी और पश्चिमी) ऐसा उपन्यास दुर्लभ है . इसमें एक ओर प्रचुर नाटकीय उपादान है. तीव्र गति से घटती दृश्य-घटनाएं हैं और प्राचीन लोक-संगीत के श्रव्य टुकड़े हैं. समग्र रूप से एक सतत आनंद और अनुभूति प्रवणता है. ऐसा लगता है कि लेखक के भीतर की छटपटाहट वर्षों से बहार आने के लिए बेचैन थी. इसलिए उनके इस उपन्यास में जो आन्तरिकता है, वह अवर्णनीय है. मैंने फिल्म बनाते हुए सभी घटनाओं को अद्वैत की नज़रों से देखने की कोशिश की है. उन्होंने जिस समय तितास को देखा था, तब तितास और उनकी तीरवर्ती ग्रामीण-सभ्यता मरणासन्न थी. मैंने फ़िल्म में मृत्यु के बाद उसके पुनर्जीवन की कल्पना की है. मेरी फिल्म में गाँव नायक है तो तितास नायिका, जो फिर से युवा हो गई है.”
तितास मालो लोगों के लिए महज एक नदी नहीं है, वह अपने मानवीकृत रूप में हर कदम मछेरो के साथ चलती है. भोज हो, व्रत हो, तीज हो, त्यौहार हो, कर्मकांड हो …सब कुछ. मानो बिन तितास सब सून. विभाजन से पूर्व मालो हिन्दुओं और बंगलादेशी मुसलमानों के मध्य आपसी भाईचारा और सौहार्द इस उपन्यास में खुल कर आया है. बाउल,सूफ़ी और आध्यात्म दोनों सम्प्रदायों के अपने हैं. खान-पान से लेकर तीज-त्यौहार, बोली-भाषा सब समान हैं. ये उनके त्योहारों में शामिल होते हैं वे इनके. जब तितास उतरती है तो उसके तटों पर ये किसान फसल बोते-काटते और जब तितास उफान पर होती है तो किसानो के घर के सामने बहती नदी में हँसते-ठिठोली करते मछेरे मछली मारते हैं. खेतिहरों और मछेरों की संस्कृतियो का यही मिला जुला रूप तितास की आत्मा है. जब तक यह सौहार्द कायम है तितास कायम है या इसे यूँ भी कह लें कि जब तक तितास में जल है यह प्रेम, यह आत्मीयता कायम रहेगी. अंत में जब तितास सूख जाती है तब यही किसान जमीन कब्जियाने के लिए कितने की कमज़ोर मछेरों को लाठियों से पीट पीट कर मार देते हैं.
यह उपन्यास चार खण्डों में बंटा है और हर खंड में दो-दो अध्याय हैं. उपन्यास का पहला अध्याय पढ़ते हुए ऐसा लगता है मानो आप उपन्यास नहीं तितास पर लिखा एक लंबा निबंध पढ़ रहे हों. इस अध्याय को पढ़ते हुए उपन्यास में मेरी दिलचस्पी लगभग ख़त्म होते होते बची. कभी लेखक तितास के इस नाम की मनोवैज्ञानिक, सामजिक, मिथकीय और दार्शनिक व्याख्या करता है तो कभी तितास के उदय और विस्तार पर लम्बे उबाऊ भाषण झाड़ने लगता है. इन्ही उबाऊ भाषणों के बीच धीरे से छोटी-छोटी कहानियाँ निकलने लगती है जो उपन्यास के लम्बे कथासूत्र का प्रारम्भ करती है. लेखक को पता है की पाठक को कैसे बाँध के रखना है. जब उन लम्बे वर्णनों से मन उचाट होने लगता है तभी लेखक तितास के मालो परिवार की मार्मिक दशा की तरफ पाठक को ले जाता है- “हाड़तोड़ मेहनत के बाद जब एक दिन उसे कुछ नहीं मिला तो वह एक बजबजाते पोखरे में उतर ही गया और अपना जाल उसमे फेंका. तीन चार मेंढक फंसे लेकिन वे भी कूदकर बाहर निकल गये. रह गया सूना जाल और गौरांग की शून्य में ताकती नजरें.” भूख और ग़रीबी से मरते हुए इंसान का शब्द-चित्र लेखक ने बड़े यत्न से खींचा है. भूख इन्सान की संवेदनशीलता को खा जाती है. मृत्यु कितनी सुखद होती है यह एक ग़रीब बता सकता है और यह कितनी भयावह होती है यह उससे पूछो जिसे कभी फाकाकशी में रातें न गुजारनी पड़ी हों- “कितना अच्छा हुआ वह मर गई- वह मन ही मन बुदबुदाया.” हिंदी साहित्य में प्रेमचंद के पात्र ‘घीसू’ और ‘माधव’ भी ‘बुधिया’ के लिए यही कहते हैं. भूख व्यक्ति को निष्ठुर बना देती है. गौरांग का बड़ा भाई नित्यानंद, अपनी भूखी उंघती पत्नी और मुंह जोहते बच्चों को देखते-देखते इसका आदी हो जाता है. वह अपनी भी भूख को भूल निश्चल भाव से सारा दिन हुक्का पीता रहता है. और रास्ता भी क्या है, न पानी , मछली, न अन्न.
यह उपन्यास मालो समाज की संस्कृति को बड़े करीने प्रस्तुत करता है. जीवन-मरण, विवाह, भोज, प्रथम नौका पूजन, नदी पूजन आदि सभी कुछ विस्तार से मिलता है- “जन्म के आठवें दिन बाद कलाई की रस्म होनी थी. टोले के अन्य बच्चों के साथ अनंत को भी बुलाया गया. खोई,भुनी मटर, बताशों से उसने भी खोइंछा भर लिया था. तेरहवें दिन अशौच ख़त्म हुआ”. लोकगीतों की तो इस उपन्यास में भरमार है. मालो संस्कृति में हर अवसर के लिए गीत हैं. लेखक ने लोक से गीतों के संकलन में निश्चय की परिश्रम किया होगा. यहाँ महिलायें हर उपलक्ष्य में गीत गाती है तो पुरुष भी कीर्तन और लोकगीतों में रमते हैं. एक झलकी इस प्रकार है-
देख रानी भाग्यमान
रानिर कोलेते नाचे दयाल भगवान
नाचरे नाचरे गोपाल
खाईयां क्षीर ननि नाचिल बनाईबा दिबो हस्तेर पाचनि
एक बार नाच दुई बार नाच
तीन बार नाच देखि
नचाईले गड़ाइबा दिबो हस्तेर मोहन बांसी
लोक की लोकोक्तियों का व्यापक प्रयोग हुआ है. लोकोक्तियों का यह प्रयोग इस उपन्यास को बंगाल की माटी से जोड़ता है-
- “दुर भाग यहाँ से …स्यावणा गाछ के कौए”
- “पूत तो कुत्ते का मूत है”
उपन्यास अंततः त्रासदी के साथ ख़त्म होता है. बासंती उर्फ़ सुबला बऊ तितास एक लोटा जल की अतृप्त इच्छा के साथ नदी के बीचोंबीच खड़ी है. पर नदी में जल का नामोनिशान तक नहीं है. श्वेत रेत चारो ओर फैली है. बासंती बार-बार दिवास्वप्न देखती है कि वह तितास के शीतल जल में डुबकी लगा रही है. उसे अचानक सारी पुरानी बाते स्मृत हो आती है. उसने कहा है की तरह वह ‘फ़्लैश बैक’ में सुखद अतीत देखती है. अंततः वह गिर जाती है फिर कभी न उठने के लिए… और फिर कुछ दिनों बाद बारिश आती है. नदी लबालब भर जाती है मानो फिर से अपने मछेरों को आमंत्रण दे रही हो. लेकिन अब मछेरे नहीं हैं. अब कोई नहीं है. यह उपन्यास मालो संस्कृति का एक जीवंत दस्तावेज है. विधवा विवाह (पृष्ठ सं-165), सामंतवादी मूल्य, सूदखोरी जैसे तमाम प्रसंग इस उपन्यास में उपस्थित हैं. स्त्री विमर्श और दलित विमर्श की चेतना के आलोक में इस उपन्यास का अध्ययन किया जा सकता है.
पुस्तक- तितास एक नदी का नाम
लेखक- अद्वैत मल्ल्बर्मन
अनुवादक- चन्द्रकला पाण्डेय, जय कौशल
प्रकाशक- मानव प्रकाशन, कोलकाता
ISBN- 978-93-80332-55-0