नागार्जुन की काव्य दृष्टि आत्मभिव्यक्ति की राहत पा लेने का साधन मात्र नहीं है, बल्कि आत्म-दोष से मुक्त होकर नई राह खोजने वाली काव्य दृष्टि है। नागार्जुन की यह सबसे बड़ी खासियत है कि वह आत्मलोचन और आत्मनिरीक्षण करते हुए लोगों को भी इसके करीब लाते हैं और पाठक वर्ग को भी अपनी भाव-प्रतिक्रियाओं के एकाग्र अध्ययन और निरीक्षण करने के लिए बेजोड़ तरीके से उकसाते हैं। नागार्जुन का यह उकसाना क्रांति भाव ही है जो उनके काव्य मिजाज का अंदाजा दिलाता है। उनके काव्य मिजाज की व्याख्या करता है।असल में नागार्जुन की कविताओं का पाठ जिस-जिस ने भी अपने समय में किया होगा; वह जरूर आत्म-ज्ञान और वाह्य ज्ञान से परिचित हुआ होगा कि समाज के प्रति किस तरह से प्रतिबद्ध होना चाहिए। ‘प्रतिबद्ध हूँ’, ‘हाशिये के समाज का कवि हूँ’, इस तरह की काव्य दृष्टि या प्रौढ़ चिंतन नागार्जुन के यहाँ अकारण ही नहीं आए हैं। नागार्जुन की काव्य दृष्टि में कुछ तो उनके जीवनानुभूति और काव्यानुभूति के बीच के उसी ऊर्जस्वी अहसास, रूप-रस-गंध, जनता का कवि, किसानों के प्रति लगाव और क्रांति की ज्योति ही रहे होंगे जो नागार्जुन की कविताओं में शुरू से लेकर आखिरी तक सक्रिय दिखाई देते हैं, बिल्कुल यायावरी प्रवृत्ति की तरह।
दरअसल, कवि की काव्य दृष्टि समाज के यथार्थ चित्तवृति और कल्पना को लेकर निर्मित होती है। कवि अपने समाज की उधेड़-बुन से भलीभाँति परिचित रहता है और वह उन सब विकृतियों, सजावट-बनावट और भव्यता को काव्य में जगह देता है । ज़ाहिर है नागार्जुन की यह सबसे बड़ी विशेषता है जो उन्हें सामाजिकता के व्यापक दायरे में बाँधती है। उनकी काव्य चेतना में गाँव और शहर का समतावादी सेतु स्थापित कर विशिष्टता बोध को मिटाती है। जो सबको सुलभ हो सके। भले उसके मायने अलग-अलग हो। तभी कविता, कविता होती है। इस संदर्भ मे कवि कुँवर नारायण ने लिखा है, “कविता मनुष्य के दिल और दिमाग के जितना ही नज़दीक अपनी जगह बनाएगी, उसके लिए जीवित रहना उतना ही संभव और अर्थपूर्ण होगा।”1 इस तरह के काव्य रचना को प्रगतिशील और सामाजिक सरोकार से सम्बद्ध माना जा सकता है । केदारनाथ सिंह का कहना है, “नागार्जुन गहरे अर्थ में एक आधुनिक दृष्टि-सम्पन्न कवि हैं।”2
सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से उनकी कविता में ऐतिहासिक, राजनीतिक, आर्थिक घटनाओं के साथ-साथ व्यंग्य, प्रेम, लोक और शास्त्र तक को आधार बनाती है और अपनी दमदार प्रस्तुति को लेकर उनकी कविता आजादी से पहले और आजादी के बाद तक का सफर तय करती है। जिससे हम नागार्जुन के काव्य यात्रा से उनके समय के इतिहास को जान और समझ सकते हैं। चूँकि उनकी कविताओं का कथ्य आजादी के बाद का समाज और आजादी के पहले के समाज और राजनीति का समाहार है। इसलिए इनकी कविताएँ अपने समय की सबसे पुख्ता ऐतिहासिक दस्तावेज़ पेश करती है। । नागार्जुन ने विषकीट निबंध में स्वयं कहा है, “कबीर से मैंने दो-टूक अक्खड़पन लिया है और निराला से स्वाभिमान का संस्कार।”3 नागार्जुन ने इतिहासबोध और समकालीन राजनीति को केंद्र में रखकर कविता में नयेपन का सूत्रपात किया। कविता में नएपन का प्रयोग जिस तरह नागार्जुन ने किया था, उसकी भाषा और संवेदना आम जनमानस के कंठ में इस तरह समा गई कि नागार्जुन को जनता का कवि कहा जाने लगा। नागार्जुन की इसी ख़ासियत ने उन्हें बहुजन समाज के प्रति इस तरह उन्मुख और प्रतिबद्ध किया हैकि नामवर सिंह ने इनको आधुनिक युग का कबीर तक भी कह दिया। उन्होंने सामाजिक जीवन के जिस यथार्थ को जैसे देखा, जैसे जिया उसको उसी तरह कविता में पिरोने का यथा संभव प्रयास किया। जो उनके प्रगतिशीलता और यथार्थवाद का सच्चा प्रमाण है। मुक्तिबोध अपने चिंतन प्रक्रिया में कहते हैं, “कोई भी दृष्टिकोण, यानि कोई भी साहित्यिक ‘वाद’ तभी तक ठीक है जब तक वह जीवन की चेतना से परिपूर्ण है। यथार्थवाद जिसे आजकल वर्गवादी प्रगतिवाद कहते हैं, तभी तक ठीक है जब तक उसका लेखकअपनी स्फूर्ति, वास्तविक स्थिति से पता है।”4 ज़ाहिर सी बात है कि नागार्जुन ने लोक में व्याप्त उन सभी तत्वों कि शिनाख्त की है और अपना जीवन भी उसी तरह जिया है जैसे मुक्तिबोध का चिंतन है। अजय तिवारी का कहना है, “जीवन की विपुल अनुभव-राशि किसी कवि की चेतना को किस रूप में ढ़ालती है, नागार्जुन की कविताएँ इसका अकाट्य उदाहरण हैं।”5 नागार्जुन ने अपनी कविताओं का कथ्य-रूप और यथार्थ जनता को केंद्र मे रख कर गढ़ा है। जैसा कि नामवर सिंह ने कहा है, “नागार्जुन स्वाधीन भारत के प्रतिनिधि जनकवि हैं।”6 बिलकुल ‘तरल आवेगोंवाला, अतिभावुक, हृदयधर्मी जनकवि।’ नागार्जुनअपनी इसी जनवादिता के कारण काव्य कला के शुरुआती दौर से ही शासन पर तीखा प्रहार करना शुरू कर चुके थे और अंतिम तक करते रहे । वे जनता के हित के लिए जन आंदोलनो और किसान आंदोलनों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे।उनकी यह क्रांतिकारिता जवानी से लेकर बुढ़ापे तक बनी रही। बल्कि यूँ कहें कि इनकी काव्य दृष्टि में समाज की हर गतिविधि जो समाज के लिए दुष्कर है, वह क्रांति बोध में निखरती गई। क्योंकि काव्य दृष्टि में हम कवि के सामाजिक संबद्धता को देखने और परखने की कोशिश करते हैं। वह इसलिए कि कवि की दृष्टि समाज को किस रूप में देखती है कि कवि कितना सामाजिक है। जिससे यह स्पष्ट हो सके कि कवि अपने इतिहास और वर्तमान से कितना जुड़ा है जिससे कवि की चिंतन धारा या काव्य दृष्टि समझी जा सके। चूँकि यह तभी परिभाषित हो सकता है, जब कवि की काव्य दृष्टि समाज को लेकर प्रतिबद्ध हो, संवेदनशील हो, श्रम में सौंदर्य की परख रखता हो, संस्कृतियों की शिनाख्त करता हो और इतिहास को खंगालता हो। कहने का आशय यह है कि कविता में समाज को यथार्थ रूप में अपनी पूरी इतिहास दृष्टि और यथार्थ के साथ प्रस्तुत करता है अथवा नहीं। जो कवि का धर्म है।अजय तिवारी का कहना है, “देश की साधारण जनता से कवि लगाव जितना गहरा और आत्मीय होगा कवि के वर्ण और आस्वाद में उतनी विविधता होगी, कवि की संवेदना उतनी ही सघन होगी, कविता का यथार्थवाद उतना ही गंभीर होगा और काव्य की जीवनीशक्ति उतनी ही दुर्दम होगी।”7 नागार्जुन के कविताओं में अजय तिवारी के इस कथन को भलीभाँति देखा जा सकता है। बल्कि यूँ कहें कि कविता और जीवन दोनों में देखा जा सकता है।हालाँकि मुक्तिबोध इस तरह की कविताओं से इत्तेफ़ाक नहीं रखते है, “साहित्य का उद्देश्य सांस्कृतिक परिष्कार है, मानसिक परिष्कार है। किन्तु यह परिष्कार साहित्य के माध्यम द्वारा तभी संभव है जब स्वयं सुननेवाले या पढ़नेवाले की अवस्था शिक्षित (की) हो।”8 जबकि मुक्तिबोध के एकदम विपरीत हैं नागार्जुन। वह जनता के लिए जनता से होकर गुजरने वाले कवि हैं और उनकी रचनाएँ भी जनता के लिए और जनता से होकर गुजरती हैं। अब वह जनता शिक्षित और अशिक्षित दोनों हो सकती है उसमें विभाजन की लकीर नहीं खींची गई है नागार्जुन की ओर से जैसा कि मुक्तिबोध खीचते हैं। इसलिए इनकी कविताओं में अपनेपन का एहसास झलकता है। नागार्जुन ने जिस प्रकार की कविताओं की रचना की है उसी तरह का जीवन भी जिया है। पूरे भारतीय जन-मन के मनोदशा और सामाजिक सरोकार को समझकर कविताएँ लिखी हैं। “नागार्जुन के काव्य का एक महत्त्वपूर्ण गुण है कि उनकी कविता स्थान विशेष की कविता न होकर पूरे हिन्दी प्रांत की और पूरे देश की कविता है।”9 ज़ाहिर सी बात है नागार्जुन की हाशिये संबंधी दृष्टि में देश ही नहीं बल्कि देश के बाहर के महाद्वीपों की भी कविताएँ हैं। इसलिए बड़ा कवि वही हो सकता है जो दूर दृष्टि और जीवन दृष्टि रखता हो। जो अपने से इतर सोचता हो। समाज के लिए सोचता और जीता हो।
नागार्जुन ने अपनी काव्य दृष्टि को व्यापक रूप देते हुए अपने इर्द-गिर्द से सम-विषम तत्वों और वस्तुओं को इक्कट्ठा करके अपनी कविताओं में व्यंग्य का प्रयोग बहुत धारदार तौर पर किया है। नेताओं की जमकर ख़बर लेते हैं। उनकी कविता ‘भारत-भूमि में प्रजातंत्र का बुरा हाल है’कविता की एक बानगी देखिए-
“लालबहादुर नीचे, ऊपर कामराज है
इनकिलाब है नीचे, ऊपर दामराज है10
नागार्जुन इन सबकी ख़बर लेते हुए कविता के दूसरे खंड में जनता के पक्ष में बोलने का जो साहस दिखाया हैं वह बेमिसाल है। ऐसा लगता है कि इस अक्खड़पन को देखकर सामने वाले का मुँह झौंवां हो गया हो। झौंवां हो क्यों न? अजगर की तरह अस्सी प्रतिशत जनता का हक़ जो मार बैठे हैं। नागार्जुन की राजनीतिक व्यंग्य प्रधान कविताओं से यह आभास होता है कि वास्तव में इस दुनिया में दो दुनिया हैं, दुनिया है अमीरों और गरीबों की, शोषक और शोषितों की। नागार्जुन ने जिस सामाजिक-आर्थिक विषमता को अपने कविताओं का विषय बनाया है और उसे जबर्दस्त तरीके से पेश किया है .इसी संदर्भ में अरुण कमल का कहना है, “अपने देश की जनता का दुख-दर्द नागार्जुन के कविताओं में पूरी तीव्रता से व्यक्त हुआ है। खासतौर से गाँवो में रहने वाले गरीबों की ज़िंदगी, उनकी तबाही का बहुत ही मार्मिक चित्रण उन्होंने किया है।”11
नागार्जुन की एक कविता है ‘घर से बाहर निकलेगी कैसे लजवंती’ अब आप देखिए और सोचिए कि कवि क्या कहना चाहता है? ज़रा ‘लजवंती’ शब्द पर गौर करिए और देखिए कि नागार्जुन ने इस कविता को कितनी मार्मिकता से एक शब्द पर टिका दिया है और तीव्र स्वर में कहता है कि-
“फटे वस्त्र हैं, घर से बाहर निकलेगी कैसे लजवंती
शर्म न आती, मना रहे वे महँगाई की रजत जयंती”12
नागार्जुन इसी जोश-होश के साथ प्रजातंत्र की ख़बर लेते हुए भारतीय लोकतंत्र के पैरोकारों और देशी सामंतों पर (जिसके उत्पीड़न से उनकी काव्य दृष्टि का निर्माण हुआ) अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए उन्होंने अपनी एक कविता ‘प्रतिहिंसा ही स्थायी भाव है’ में लिखते हैं-
“प्रतिहिंसा ही स्थायी भाव है मेरे कवि का
जन-जन में जो ऊर्जा भर दे, मैं उद्गाता हूँ उस रवि का।”13
संभवत: नागार्जुन की प्रतिहिंसा भी उनकी क्रांतिकारी चेतना का सकारात्मक पक्ष है। वह अपने रोष और जनता की मनःस्थिति को समझते हैं। इसलिए वे अपने रोष को काव्यात्मक ढ़ंग से प्रस्तुत करके जन-जन में ऊर्जा भरने का प्रयास करते हैं। नागार्जुन के भीतर शासन के प्रति इतना ज्यादा रोष भरा है कि वे यह कहने में तनिक भी नहीं हिचकिचाते कि खद्दरधारी नेता और सामंतों ने मिलकर प्रजातंत्र का होम कर दिया है। नागार्जुन की अपनी एक कविता है ‘प्रजातंत्र का होम’ उसमें कवि ने सामंती समाज और खद्दरधारी लोगों की बख़िया उधेड़ कर रख दी है।
“जनकवि हूँ, क्यों चाटूँगा मैं थूक तुम्हारी
श्रमिकों पर क्यों चलने दूँ बंदूक तुम्हारी?”14
नागार्जुन की व्यंगयात्मक शैली का कोई सानी नहीं। उन्होंने मात्र दो शब्दों ‘जगत्-तारणी’ और ‘मुखौटे’ से ही पूरा का पूरे नेहरू परिवार और इन्दिरा गाँधी पर व्यंग्य किया है। ऐसा लगता है नागार्जुन नेहरू के शासन काल से संतुष्ट नहीं दिखते हैं। इसलिए इन्दिरा को जगत्-तारणी की उपमा देकर उन पर तीखा व्यंग्य कर रहे हैं कि अब इनकी बारी हैं, जबकि इनके कई मुखौटे हैं यह क्या जनता के पक्ष में, जनता के लिए करेंगी?अगर करती तो क्या सारा भारत लाठी-गोली का शिकार होता?
कवि इसी विसंगति बोध को देखकर और तीखा व्यंग्य करता हुए लिखता है कि ‘नशा चढ़ा था बे अंदाज’, ‘और बस अंधकार है’, इसी अंधकार को वह ‘आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी’ के रूप में देखता है और जवाहरलाल नेहरू (वह कोई भी व्यक्ति हो सकता है जो सामाजिक हितों और विचारों के निमित्त है) से लेकर भारतीय शासक वर्ग जो रानी एलिज़ाबेथ के स्वागत में खड़े हैं उन पर लक्ष्य करके वह सामाजिक या राजनीतिक परीस्थितियों पर व्यंग्य करता है-
“आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी,
यही हुई है राय जवाहरलाल की15
कवि को अपने इतिहास की समझ है, वह इतिहास को जानता है, वह यह भी जानता है कि, हम आज़ादी से पहले भी औपनिवेशिक सत्ता के गुलाम थे और आज भी वहीं स्थिति है, आज भी भारतीय जनता इनका बोझ ढ़ोए।
किसी भी कवि के काव्यानुभूति से ही उसकी काव्य दृष्टि को जाना जा सकता है। यह काव्यानुभूति कवि अपने देश, काल, वातावरण से इकट्टठा करता है और शब्दों के माध्यम से लयबद्ध करता है। यह लयबद्धता उसके स्वयं के अनुभव पर टिकी होती है। इसी लयबद्धता या काव्यानुभूति से कवि की पहचान की जाती है। यही काव्यानुभूति कविता की सर्जना शक्ति भी होती है। प्रो. मैनेजर पाण्डेय के अनुसार, “किसी कविता की शक्ति की पहचान का एक आधार यह है कि उसकी काव्यानुभूति की संस्कृति का स्वरूप क्या है?जो कवि अनुभव के स्तर पर ज़िंदगी की विविधता से जितनी गहराई से जुड़ा होता है उसकी काव्यानुभूति की संस्कृति उतनी अधिक समृद्ध होती है।”16 ज़ाहिर सी बात है कि इस काव्यानुभूति की संस्कृति को नागार्जुन के यहाँ स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। उनकी कविताएँ इसका जीता-जागता प्रमाण हैं। इतना ही नहीं उनका ठेठ देशीपन और उनकी कविता की बानगी, भाषा उनके देश काल की पहचान है। लोक की पहचान है। इनकी रचनाओं की ख़ुशबू से अनुमान लगाया जा सकता है कि नागार्जुन किस देश के मानुष हैं, कवि हैं। यहाँ पर नागार्जुन की एक पूरी कविता ‘प्रतिबद्ध हूँ’ का उदाहरण देखा जा सकता है। जिसमें कवि ने अपनी पूरी ईमानदारी के साथ अपने आप को भौतिक जगत से इस तरह जोड़ा है कि बहुजन समाज, सचर-अचर सृष्टि और परिजन के प्रेम की डोर से निकल पाना मुश्किल है। नागार्जुन की पूरी कविता की बानगी देखिए, जिसके तीन स्तम्भ हैं-
“प्रतिबद्ध हूँ / सम्बद्ध हूँ / आबद्ध हूँ
प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, प्रतिबद्ध हूँ-
बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त-17
प्रगतिशील साहित्य में इस प्रकार की चेतना का होना लाज़मी है, अगर इस प्रकार की चेतना न हो तो प्रगतिशील सौंदर्यबोध की ख़ामी या फिर कवि की कमी मानी जा सकती है। इस कविता मे नागार्जुन ने आदि से अंत तक का जो रेखा-चित्र खींचते हैं. वह देखते ही बनता है, कोई भी तत्व कवि की दृष्टि से ओझल नहीं हुआ है। सबको समेटे हुए एक साथ रहते हैं और बार-बार कहते हैं कि मैं शतधा आबद्ध हूँ अर्थात सौ प्रकार से बंधा हुआ हूँ। जीवन के हर क्षण में, हर लय में, गति में, प्रगति में, दुख में, सुख में, सम्पत्ति में और विपत्ति में। यह है प्रगतिशील कवि का व्यक्तिव और काव्य दृष्टि जो जन-मन से सम्बद्ध होकर अपनी कविताओं का कथ्य बुनता है। कवि की इस तल्लीनता, संवेदना और प्रतिबद्धता को फायरबाख की इस सिद्धान्त को पुष्ट करती है, “मनुष्य को अपनी सर्वसाधारण एवं सार्वभौमिक मानवीयता की चेतना इसी स्वतन्त्रता के कारण प्राप्त होती है; दूसरे शब्दों में, मानव-सुलभ चेतना इसी स्वतन्त्रता में अन्योन्याश्रयता का संबंध होता है। जानवर की चेतना अपने तक ही सीमित रहती है, उसमें व्यापक पशुता की चेतना कभी नहीं आती है। जानवर के बाह्य तथा आंतरिक जीवन में कोई अंतर नहीं होता है, लेकिन मनुष्य का आंतरिक जीवन उसके बाह्य जीवन से भिन्न होता है। मनुष्य के आंतरिक जीवन में उसकी व्यापक मानवता की चेतना प्रबल होती है, न कि उसके विशिष्ट व्यक्तित्व की चेतना। विचारों तथा भावनाओं का मानवीय आंतरिक जीवन प्रत्येक व्यक्ति को उसे मानवजाति-मात्र से संबद्ध किए रहता है। अकेले में भी व्यक्ति मनुष्यता की व्यापक चेतना से भरपूर रहता है; उसके विचारों के अस्तित्व और व्यापार का आधार यही चेतना होती है।”18 नागार्जुन की इसी कविता से हम उनकी प्रकृति चेतना को देख सकते हैं। प्रकृति के प्रति नागार्जुन का भाव बोध क्या है?हालाँकि नागार्जुन की और भी बहुत सी कविताएँ प्रकृति पर हैं, लेकिन ‘प्रतिबद्ध हूँ’ कविता में कवि की संवेदना और रागात्मकता का रूप ही अलग है। नागार्जुन की प्रकृति संबंधी कविताओं में लोक जीवन का जो दृश्य आया है उसे प्रकृति से अलग करके देखना नाइंसाफी होगी। वह इसलिए कि प्रकृति में ही लोक व्याप्त है। गाँव, खेत-खलिहान, पशु-पंक्षी, नदी-तलाब, रूप-रंग, रस-गंध और पर्वत-पहाड़ सब व्याप्त है। इसलिए इसे प्रकृति से अलग करके देखने के बजाय संपूर्णता में देखा जाना चाहिए। क्योंकि नागार्जुन ने भी कहा है कि ‘मेरी भी आभा है इसमें।’ गौर करने वाली बात यह है कि नागार्जुन ने इतने मार्मिक ढ़ंग से प्रकृति और गाँव को केंद्र में रख कर कविताएँ लिखी हैं जो छायावादियों से एकदम अलग हैं। एकदम यथार्थ से लैस। ‘बहुत दिनों के बाद’ कविता का एक उदाहरण देखिए-
“बहुत दिनों के बाद
अब की मैंने जी-भर भोगे
गंध-रूप-रस-शब्द-स्पर्श सब साथ-साथ इस भू पर
-बहुत दिनों के बाद”19
कवि की यह जीवन दृष्टि अपने गाँव की ओर लौटे हुए व्यक्ति को यह एहसास कराती है। उसे गँवई खुशबू और संस्कृति में घुल जाने का बोध कराती है। गँवई होने का आभास कराती है। इसी संदर्भ में मैनेजर पाण्डेय का कहना है, “बहुत दिनों बाद कविता में अपने गाँव की प्रकृति और संस्कृति से गहरे लगाव की अभिव्यक्ति है।”20 ज़ाहिर है नागार्जुन के इसी गँवई संस्कृति बोध को लेकर रामविलास शर्मा ने मैनेजर पाण्डेय के एकदम उलट कहा है, “नागार्जुन मूलतः ग्राम कवि हैं।”21
नागार्जुन की काव्य चेतना ठहरा हुआ पानी नहीं है जिसमें बुलबुले निकले हुए हो। बल्कि उनका काव्य, सागर जैसी अथाह और असंख्य नाड़ियों को समाहित करने की क्षमता रखता है। उनकी काव्य दृष्टि जल प्रवाह की तरह है जिसे वह अपने भीतर समाहित कर लेते हैं और उसे अपने अनुभव और पद्धति के माध्यम से नया रूप देते हैं। इनकी चिंतन धारा में यथार्थ और इतिहास की झाँकी आसानी से देखी जा सकती है। प्रेम की झलक देखी जा सकती है। लेकिन हिन्दी साहित्य के आलोचकों की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि वह किसी भी कवि के विविध पक्ष को न देखते हुए उसे बस एक खाँचे/साँचे में ही रखकर देखते हैं, न की सम्पूर्णता में। सवाल यह है कि क्या किसी कवि का सम्पूर्णता में मूल्यांकन न करना उसके साथ नाइंसाफ़ी नहीं है?यही दृष्टि नागार्जुन के साथ अपनाई गई । सवाल यह है कि क्या कोई कवि अपने सामाजिक सरोकारों और रूप-रस-प्रेम से कट सकता है?क्या नागार्जुन के प्रेम संबंधी कविताओं से उनकी प्रगतिशीलता कमतर आँकी जा सकती है?ज़ाहिर सी बात है नागार्जुन को अपनी प्रगतिशीलता का भान है। वह यह भी जानते हैं कि प्रेम ही दुनिया को एक मुहाने पर लाकर खड़ा कर सकता है। चाहे वह पति-पत्नी में हो, प्रेमी-प्रेमिका में हो, शत्रु-शत्रु के बीच हो या फिर देश-विदेश से हो। इसलिए नागार्जुन की काव्य दृष्टि में प्रेम रूपी स्वर मिलता है। बहरहाल, नागार्जुन की एक कविता है, ‘आओ प्रिय, आओ’ कवि की इस कविता में मित्र-प्रेम झलक रहा है। मित्र से बहुत दिनों बाद मुलाक़ात हो रही है, वह रूठा है। कवि आग्रह करता है कि मेरी सारी गलतियों को भुला दो और मुझसे कुछ बातें करो। एक उदाहरण देखिए-
“आओ प्रिय, आओ!
बहुत दिन हो गए,
आज फिर साथ-साथ बैठे घड़ी-आध घड़ी
ऐसी भी नफ़रत क्या !
इतना भी अलंघ्य है विरक्ति का प्राचीर?”22
नागार्जुन ने प्रेम कविताओं के जरिए जो दुनिया बनाई है उसमें प्रवेश करने पर नाना रूपी प्रेम दिखाई देता है। कहीं पति-पत्नी प्रेम ‘सिंदूर तिलक भाल’ में दिखाई देता है तो कहीं ‘यह दंतुरित मुस्कान’ पुत्र-प्रेम के रूप में दिखाई देता है। इसके अलावा भी अन्य कविताएँ हैं जिसमें ‘प्रत्यावर्तन’, ‘उन्हें प्रणाम’, ‘तुम किशोर तुम तरुण’ से लेकर ‘क्या अजीब नेचर पाया है’ तक का सफर तय करते हुए दूर तलक निकल जाते हैं।
नागार्जुन ने अपने काव्य दृष्टि में ‘हाशिये के समाज’ की संवेदना को उजागर करते हुए वे सब कुछ कह जाते हैं। जो हाशिये के समाज के साथ हो रहा है या फिर जिस तरह वह अपना जीवन यापन कर रहा है। वे खुद को हाशिये का अंश मानते हुए अपनी भी आभा उसमें देखते हैं और पूरी सहजता बोध और निडरता के साथ बिना संकोच के पूरे आवाम के सामने अपनी पूरी ज़िंदगी का जिक्र करते हैं। इस कथा में हाशिये का समाज शामिल हैं जो इस पूंजीवादी, विध्वंसकारी, युद्धकारी, पुरोहितवाद और दलदली राजनीति के शिकार हैं। जो इन सबसे दुखी हैं। कहने का आशय यह है कि दुनिया का वह समाज जो इन अराजक तत्वों से उत्पीड़ित है, उन सबका जिक्र नागार्जुन ने किया है। देखिए-
“अमन-चैन को कैसे मैं कड़ियों में बांधूँ!!
मैं दरिद्र हूँ
पुश्त-पुश्त की यह दरिद्रता
कटहल के छिलके-जैसी जीभ से मेरा लहू चाटती आई !
मैं न अकेला मुझ जैसा तो लाख-लाख हैं, कोटि-कोटि हैं23
अब आप देख सकते हैं कि कवि सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय की बात कर रहा है। लेकिन वह यह भी कहने से अनभिज्ञ नहीं है कि इस दानव दल में जो लोग इनकी मार से त्रस्त है, उन पर शांति की कविता कैसे लिखूँ?नागार्जुन की कविताओं में सामाजिक दायित्व बोध का एहसास होता है।
नागार्जुन के काव्य भाषा का स्वरूप एकदम अनोखा है। वे चार-चार भाषाओं (संस्कृत, हिन्दी, मैथिल, बंगला, गुज़राती) के प्रकांड विद्वान थे। उनकी कविताओं में इन भाषाओं का प्रयोग देखा जा सकता है। जिस प्रकार नागार्जुन को जन कवि कहा जाता है, नागार्जुन ने उसी अंदाज़ में जनता की भाषा का प्रयोग करते हुए जनता के लिए ही लिखा है। उन्होंने भाषा को जिधर से चाहा है उधर से मोड़ा है। उसका विस्तार किया है। यूँ कह लें कि हिन्दी भाषा को सहज-सरल बना दिया है। इनका यह सहज-सरल भाव विविधता के वजह से है। क्योंकि इनके यहाँ सम्पूर्ण समाज का जिक्र है इसलिए जितनी विविधता उतनी बातें और उतनी बोली-भाषा नागार्जुन के यहाँ हैं। भाषा और बोली का विराट उत्सव नागार्जुन के यहाँ मौजूद है। जो हिन्दी भाषा के वास्तविक दुनिया से हमारा मुखातिब करवाता है। अरुण कमल का कहना है, “नागार्जुन को पढ़ने का अर्थ है हिन्दी भाषा के वास्तविक जगत् में लौटना, हिन्दी के निजी स्वरूप और संस्कारों से परिचित होना।”24 अरुण कमल की यह टिप्पणी नागार्जुन के काव्य भाषा पर बहुत ही सटीक बैठता है। नागार्जुन काव्य भाषा की तरावट जातीय संस्कृति का बोध कराती है। क्योंकि उनकी बोली और भाषा के स्वर काफी मिला जुला रूप हमें देखने को मिलती है। इनकी यही बोली और भाषा, इनके काव्य में लयबद्धता और छन्दबद्धता को कायम रखती है। उसे और मीठी बनाती है। पाठक वर्ग को आकर्षित करती है। इनकी यह लयबद्धता और छन्दबद्धता कभी-कभी टूट कर गद्यकविता या कह लें कि छन्द मुक्त कविता का रूप धारण कर लेती है। नागार्जुन की यह विशेषता देखते ही बनती है, कि किस तरह ये एक ही कविता में भाषा को किस-किस रूप में पेश करते हैं। नागार्जुन की इस तरह की तमाम कविताएँ हैं। ‘हरिजन-गाथा’, ‘खिचड़ी विप्लव देखा हमने’, ‘कंचन-मृग’, ‘वो अंदर से बाँस करेंगे’, जैसी कुछ कविताएँ देखी जा सकती हैं। जिसमें नागार्जुन की लयबद्धता किस तरह टूटी-बिखरती और जुड़ती है यह नागार्जुन के यहाँ ही संभव है। इनकी छन्दबद्धता प्रयोगशीलता और नएपन का एहसास दिलाती है। जबकि इनकी गिनती प्रगतिशील कवियों के संदर्भ में होती है फिर भी प्रयोग की कलात्मक संस्कृति नागार्जुन ने अपनी कविताओं में खूब किया है। असल में नागार्जुन की यह संस्कारी पदावली तेवर आम जनता से लेकर शिष्ट जनता के भीतर ऐसा समाया है कि आदमी उसको पगडंडी से लेकर क्रांति के सफर तक गाता और गुनगुनता है। इनकी यही लोकप्रियता और कलात्मक सौन्दर्य हिन्दी कविता की संवृद्धता को सँजोए हुए है।
नागार्जुन का काव्य-संसार इतना विविधता से भरा पड़ा है कि वे समाज के हर वर्ग-समुदाय के समीप चले जाते हैं और वहाँ से भाषा का रूप लेकर कविता रचते हैं। जिससे उनकी कविताओं में संगीतमयता का उल्लेखनीय स्वर देखने को मिलता है। भले ही नागार्जुन की कविताओं में छन्दमुक्तता, ऊबड़-खाबड़पन और तीव्र आवेग दिखाई देता है लेकिन उसका भी एक रस है। फॉर्म है। जो कवि के भावानुभूति और जीवन की वास्तविकताओं के बोध की विविधता तथा व्यापकता से संभव होता है। स्वयं नागार्जुन ने अपने विषकीट निबंध में कहा है, “भारतीय काव्य समीक्षा में नौ रस माने गए हैं। परंतु अपनी कटु-तिक्त-चरपरी रचना के सिलसिले में मुझे एक और ही रस की अनुभूति होने लगी। यह था विक्षोभ रस।”25 असल में यह विक्षोभ रस कवि के भीतर तब पैदा होता है जब समाज की सड़ी-गली मान्यताओं, बहुजन समाज की दुर्दशा, विपन्नता, दरिद्रता, भुखमरी, अज्ञानता, गुलामी और बेरोजगारी को देख और भोग कर ही उत्पन्न होता है। नागार्जुन ने इस जीवन को देखा और भोगा है। इसलिए उनकी कविता में यह रस अनायास ही नहीं आया है।
इस तरह नागार्जुन अपने कालखंड (प्रगतिशील कविता) के सबसे यथार्थवादी कवि के रुप में हमारे समक्ष मौजूद हैं। उनकी यथार्थ चेतना में केवल बौद्धिकता ही नहीं बल्कि उसमें उनका भावबोध, उनका रागात्मक अंत: संसार पूरी तरह विद्यमान है। इसीलिए वे मानव जीवन का यथार्थवादी इतिहास पेश किए हैं। अपनी कविताओं में उन सबको स्थान दिए हैं। जिसके बिना इनकी काव्य सर्जना अधूरी रहती। नागार्जुन ने लोक का मर्म समझ-बूझकर उसको अपनी कविताओं में स्थान दिया है जो उनकी काव्य दृष्टि का मूल आधार है। दूसरे शब्दों में कहें तो जीवन के हर पहलू को और समाज के हर चरित्र और प्रकृति को छूने और पकड़ने की कोशिश की है। इन्होंने विश्व राजनीति से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक का सफर तय किया है। जिसमें इन्होंने सूक्ष्म दृष्टि का परिचय देते हुए अपने काव्य जगत में यह दर्शाया है कि हमारे भूखंड पर किस-किस प्रकार के अराजकतावादी तत्व मौजूद हैं। नागार्जुन ने राजनीति की उथल-पुथल, विचारधाराओं का संघर्ष तथा उत्थान और पतन, साहित्य-संस्कृति और कला के क्षेत्र में अवधारणात्मक बदलाव, सामंती व्यवस्था का रूप और चरित्र का बदलता स्वरूप, उपभोगतावादी समाज में वर्गान्तरित होता मजदूर वर्ग, नवपूँजीपतियों की बढ़ती हुई संख्या, भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार का बढ़ता हुआ दल, दिन-प्रतिदिन बढ़ता खोखले बुद्धजीवियों का समुदाय और विश्वसनियता खोता बुद्धजीवियों का समुदाय, अय्याशी परस्त जीवन यापन करने वाला जनसमूह, संस्कृति के नाम पर नवभिजात्य वर्ग का उपभोगवादिता और परजीवीपन, लोक विरोधी कलाकारी और साहित्य वाद की उपज, रोज-रोज मजदूर वर्गों की बढ़ती मुश्किलें और उनके जीवन यापन का प्रबंध न कर पाने की नकाम कोशिश करने वाले राजनेता, संगठित होते नवदल सामंती उनको ‘दीवक’ की तरह चूस रहे हैं। मजदूर और किसान इनकी चंगुल में जकड़े हुए हैं। तानाशाही और नौकरशाही इनके सामने घुटने टेक कर ‘सिजदा’ और ‘पायबोस’ का राग अलाप रहे हैं। जबकि इनका धर्म है लोक हित और लोक रक्षा। यह है प्रगतिशील लेखन और लेखक का कर्तव्य जो अपनी प्रगतिशीलता के स्तर पर जीवन के हर पहलू को छुए। समाज के जीवनानुभव से होकर गुजरे। यही काम नागार्जुन ने अपनी कविताओं में किया है। वह चुप नहीं रहें बिना लाग-लपेट के सच को सच कहने का दावा पेश किया है। ऐसा नहीं कि आँखों पर पट्टी बाधकर विमुख होकर निकल गए हों। बल्कि अपना नैतिक धर्म का पालन करते हुए वह मुँह खोलना ही उचित समझते थे। इसी प्रकार की निडरता और फक्कड़पन भरा अंदाज केदारनाथ अग्रवाल, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जैसे कवियों की एक पूरी बिरादरी ही इस त्रास को लेकर क्षोभ और वेदना से ग्रस्त है। इसी क्षोभग्रस्तता को नागार्जुन ने तोड़ा है। अस्सी प्रतिशत जनता का कवि होते हुए। बहुजन समाज के प्रति प्रतिबद्ध होकर। अपने फक्कड़पन के अंदाज में कबीरपंथी अंदाज में निर्भीक और बेलिहाज होकर।
संदर्भ ग्रंथ-सूची-
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