एक मध्यम मछोले आकर की कद काठी, एक कलाकार या रंगरेज का चेहरा, आँखों में अदृश्य के पार देखने की ललक, मुँह और होठों पर संकोच का भाव, चाल में एक संगीत-सी लय और ठहराव… ये रेखांकन गोबिन्द प्रसाद के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। अथवा यूँ कहूँ कि गोबिन्द जी के अन्दर एक छिपा हुआ कलाकार है जो उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व में आप्लावित है। गोबिन्द जी का स्वभाव बहुत मुखर नहीं है। जब तक आप उनसे वार्तालाप नहीं करते तब तक उनके अन्दर के कवि या कलाकार से परिचय करना नामुमकिन है। वह बहुत खुले मिज़ाज के व्यक्ति भी नहीं हैं। उनके लिए यह कहना ज्यादा श्रेयस्कर होगा कि उनके अन्दर एक संकोच का भाव है, जो उन्हें जल्दी मुखर होने से रोकता रहता है। शायद इसलिए उनके लेखन में भी वह मुखरता नहीं है, जो तथाकथित लेखकों में अक्सर देखी जाती है। वह एक दो मुलाकात में शायद ही आपसे ज्यादा बात करें! वह बहुत हंसमुख किस्म के व्यक्ति भी नहीं हैं। जिन लोगों ने उनके साथ समय बिताया है और ज्ञान की गूढ़-गंभीर बातों पर उनको सुना है, सत्संग किया है, वह जानते हैं कि उनको सुनना कितना ज्ञानार्जित और खुद को परमार्जित करता है। उनके सामने हिंदी-उर्दू कविता के किसी पक्ष को उठाइए, वह उसके एक-एक रेशे को खोलकर उसके अन्दर छिपे हुए सौन्दर्य और भाषिक विधान की बारीक़ परत से सहज ही परिचित कराते चलेंगे। आप जिज्ञासावश कविता का कोई एक पक्ष ही क्यूँ, उसकी एक ‘पंक्ति’ या ग़जल का कोई ‘शे’र’ ही सुना दीजिए, वह आपको उसके मानी के अतिरिक्त उससे संबंधित अनेक शे’र से आपका साक्षात्कार करा देंगे।
एक गंभीर विद्यार्थी को उससे ज्यादा सुकून शायद ही कहीं मिले। यह मैं अतिश्योक्ति में नहीं कह रहा हूँ बल्कि बीते दस वर्ष (2010-20) के अनुभव के आधार पर उनके प्रति अपनी समझ को साझा कर रहा हूँ। उन्होंने हमें अनेक चर्चाओं के दौरान एक-एक शब्द और एक-एक वाक्य के बीच के रेशे के उद्गम तक जाकर उसकी अनेक अर्थ-ध्वनियों को सहज भाव से समझाया है। यह गोबिन्द जी के अध्ययन की व्यापकता और उसकी गहराई को प्रकट करता है। अपने छात्रों को एक शब्द पर चर्चा के दौरान अन्य भाषाओं के समानार्थी शब्दों को एक साथ रख देना और फिर उन भाषाओं में उनके अलग-अलग अर्थ प्रयोग को विनम्र भाव से समझाना गोबिन्द जी के स्वभाव का हिस्सा है।
गोबिन्द जी स्नेहिल स्वभाव के कारण विद्यार्थियों में काफ़ी लोकप्रिय हैं। अमूमन यह देखा जाता है कि शोधार्थी अपने निर्देशक से अपने शोध विषय पर ज्यादा परामर्श लेते हैं और सेंटर के अन्य शिक्षकों के पास जाने से हिचकते हैं। इसके कारण चाहे जो भी हों लेकिन गोबिन्द जी के पास आने में विद्यार्थी ज्यादा संकोच नहीं करते। जो विद्यार्थी संचोच में होते हैं, वह उनके किसी विद्यार्थी के साथ उनके पास आसानी से पहुँच जाते थे। फ़िलवक्त वह जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केन्द्र से सेवा निवृत्त हो चुके हैं। बावजूद इसके आज भी दिल्ली के अन्य विश्वविद्यालयों के छात्र उनके पास अपने शोध कार्य की समस्याएँ लेकर आते ही रहते हैं और वह बहुत ही आत्मीयता के साथ उनकी समस्याओं का निवारण करने में मदद करते हैं। गोबिन्द जी कविता के विशेषज्ञ हैं, इसलिए उनके निर्देशन में शोधरत विद्यार्थी कविता पर आनुपातिक रूप से अधिक आते हैं। पूरे जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केन्द्र में गोबिन्द जी का शोधकार्य का अध्याय विभाजन बेजोड़ था। इसलिए अन्य निर्देशकों के शोधार्थी भी उनसे अध्याय विभाजन में मदद लेने अक्सर आते ही रहते थे। गोबिन्द जी शोधकार्य में अपने शोधार्थियों को पूरी छूट देते थे। जब कभी चर्चा के दौरान शोधार्थी के कार्य के बारे में पूछते और उनकी शंकाओं का समाधान भी करते। वह विषय की समझ और शब्द एवं भाषा की शक्ति पर शोधार्थी का ध्यान केन्द्रित करना चाहते। उन्होंने जे.एन.यू. में लगभग 25 वर्ष अध्यापन कार्य किया जिसमें सैकड़ों विद्यार्थियों को शोध की बारीकियों और विषय की समझ से परिचित कराया। यह गोबिन्द जी की ऐसी पूंजी है जो उनके पास में नहीं आ सकती लेकिन उनकों विद्याथियों और शोधार्थियों के जीवन को संवारने में मदद अवश्य करेगी। अब उनके विद्यार्थी ही ज्ञान की इस पूंजी को आगे बढाएँगे।
गोबिन्द जी मेरे गुरु हैं। मैंने उनसे एम. ए. में प्रगतिशील हिंदी कविता और ‘निराला’ को विशेष रूप से पढ़ा है। तब से मैं कविता के प्रति उनकी समझ का मुरीद हूँ। मैंने उनके साथ एम.फिल. और पी.एचडी. का शोधकार्य भी किया है। इसलिए आज कविता के प्रति जो भी समझ विकसित हुई है उसमें गुरु जी का विशेष योगदान है। इनसे पढने के बाद कविता के प्रति मेरी पूर्व धारणा एकदम बदल गयी। अब मैं साहित्य की एक कथित उपेक्षित गली से होते हुए आधुनिक हिंदी कविता की उस वृहद दुनिया से हमकलाम हुआ जिसमें मुझे निराला, अज्ञेय, शमशेर, नागार्जुन, त्रिलोचन, मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, मंगलेश डबराल, राजेश जोशी के साथ कई और अनूठे कवि मिले। इन कवियों ने मुझे और-और राहें दिखाईं; जिनसे गुज़रते हुए मैं विश्व कविता से वाक़िफ़ हुआ। नाज़िम, लोर्का, नेरुदा, मैरी ऑलिवर, निकानोर पार्रा, बेन ओकरी, परवीन शाकिर, फ़ैज़, फ़राज़ और फ़िराक़ से फिर यहाँ भेंट हुई। इन कवियों के पास आकर मैंने सुकूत और आज़ार को एक साथ अपने पहलू में पाया और वह पाना ऐसा है जो उम्र भर अब मुझसे नहीं छूट सकता। कविता एक माध्यम बनी जिसने मुझे कई-कई ज़बानों के स्वप्न, संघर्ष और उनकी जातीय स्मृतियों को समझने का मौक़ा दिया। मैंने पाया, मनुष्य का भूगोल और उसकी ज़बान चाहे जो हो लेकिन कविता ने उनके जीवन के उजले-काले, धूसर रंग को बरत कर एक कैनवास में दर्ज कर लिया है।
मैंने कविताओं में कई ध्वनियों को सुना। नए शब्द रूपों को जाना। मेरी ही भाषा के कई अजाने रूप मेरी नज़रों में खुल गए। मुझे जो सीढ़ी मिली उससे मैं शब्दों, ध्वनियों, रूपों और भावों की एक ऐसी दुनिया में आ गया जहां हर क़िस्म की विविधता थी। यहाँ मैंने अछूता सौन्दर्य देखा। लिथड़ी और ग़लीज़ गंदगी देखी। हौसलों के कठोर पठार देखे। हताशा और ना-उम्मीदी की बहुत दूर तक न ख़त्म होने वाली ढलान देखी। मनहूस स्वप्नों को सच होते पाया। समाज, धर्म और राजनीति की ऐसी भूमिगत बिसात देखी जिसकी समझ सिर्फ़ समाज विज्ञान के शास्त्रों के सहारे नहीं हासिल की जा सकती। अब यहां पहुँच कर मैं कविता के सम्मोहन से मुक्त था। अब वह मेरी ज़रूरतों में शुमार हो चुकी है। मैंने जाना कि साहित्य के इतिहास का एक बड़ा अर्थ कविताओं का इतिहास है। कविता पहले एक शब्द रूप है और उसके बाद वह इतिहास भी है, झूठ-सच की कीमियागिरी भी है, भविष्यवाणी भी और ‘सभ्यता समीक्षा’ भी! बहरहाल!
गोबिन्द जी सदैव एक परफेक्शन के कायल रहे हैं। इसलिए कम लिखना और जितना लिखा उसमें उन्होंने एक परफेक्शन को खोजा है। अथवा यूँ कहूँ कि उनके सम्पूर्ण लेखन में अपूर्णता से पूर्णता की ओर जाने की ललक है। अज्ञेय ने कहा है कि ‘किसी शब्द का प्रयोग करना उसके अब तक के किए गए प्रयोग से कम अर्थ के लिए करना उसके साथ अन्याय करना है’। गोबिन्द जी की कविता, आलोचना और डायरी इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने कभी लेखन को फैशन का अंग नहीं बनाया। उन्होंने कभी कुछ भी लिखने के लिए नहीं लिखा अपितु जब उनकी अनुभूति ने कुछ विशेष समझा उन्होंने तब कुछ विशेष की खोज में, कुछ अर्थगर्भ के लिए, कुछ नया प्रभाव उत्पन्न करने के लिए सृजन किया। इसमें उन्हें कहाँ तक सफलता मिली इसका मूल्यांकन अभी बाकी है। लेकिन मैं इतना जरुर कह सकता हूँ कि ‘आलाप और अन्तरंग’ तथा ‘ख़्वाब है दीवाने का’ उनके सम्पूर्ण लेखन का स्केचचित्र/ग्राफिक्स है। उसमें कविता भी है, आलोचना भी है, कहानी भी है, संस्मरण भी है, संगीत भी है, दर्शन भी है और इन विधायों के इतर एक ऐसा साहित्य भी है जिसकी शक्ल अभी साहित्य में उपलब्ध नहीं है। इसे नितांत मौलिक कह सकते हैं। मुक्तिबोध ने ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में जिन तीन क्षणों की बात की थी, वह हिंदी साहित्य में मौलिक सृष्टि थी। उसी तरह ‘आलाप और अन्तरंग’ और ख़्वाब है दीवाने का’ डायरियों में जगह -जगह ऐसी टीपें हैं जो उन तीन क्षणों के एहसास की याद दिलाती हैं। वह चाहे रचना-प्रक्रिया, लय, ताल, संगीत, चित्रकला, बिम्ब, अनुभूति, शब्द, भाव, ध्वनि जैसी अनगिनत अव्याख्येय अथवा दुरूह समझे जाने वाले शब्दों पर इनकी मौलिक व्याख्या क्यों न हो। हिंदी में अज्ञेय, शमशेर, मुक्तिबोध के बाद इस तरह का चिंतन विरल है।
गोबिन्द जी युवावस्था में त्रिलोचन और शमशेर के सानिध्य में रहे हैं। उनके साथ हिंदी के अनेक स्वनामधन्य रचनाकारों से मिले हैं। त्रिलोचन इनके काव्य गुरु हैं। शमशेर से इन्होंने कविता को बरतने का ढंग सीखा है और अज्ञेय से शब्द का संस्कार। मुझे लगता है प्रगतिशील और नयी कविता के इन तीन कवियों ने बाद की पीढ़ी को सर्वाधिक प्रभावित किया है। मुक्तिबोध बड़े कवि हैं लेकिन वह ‘बौद्धिक कवि’ बनकर रह गए। आज भी उनकी फेंटेसी के पीछे छिपा हुआ आम आदमी का दुःख-दर्द कम ही समझ में आता है। हिंदी के पाठक वर्ग की अप्रोच ही कुछ ऐसी है कि उसे नागार्जुन लुभाते हैं लेकिन मुक्तिबोध कठिन नज़र आते हैं। नागार्जुन की कविता सहजता का आवरण ओढ़कर जीवन के गणित को आसानी से व्यक्त करती है। राजनेताओं और पूंजीपतियों पर व्यंग्यात्मक शैली में हंसती है। नागार्जुन की कविता की कमजोरी यह है कि वह हद से ज्यादा मुखर है और शब्द लाघवता में विश्वास नहीं करती। कभी-कभी लगता है कि वह कविता में कहने से ज्यादा बोलते अधिक है। यह अधिक बोलना कभी अखरने लगता है। इसका कारण है कि उनके यहाँ शब्द के अमूर्तन में अर्थ सौन्दर्य की छाया बहुत कम है। उनकी कविता वाचालता की ओर मुड़ी हुई है।
गोबिन्द जी का मन उर्दू साहित्य में खूब रमा है। मीर तकी ‘मीर’, ग़ालिब, दाग देहलवी, इक़बाल, फैज़ अहमद फैज़, फ़िराक़ गोरखपुरी, ज़िगर मुरादाबादी, ख़्वाजा अल्ताफ़ हुसैन हाली, शम्सुर्ररहमान फ़ारूकी, इंतजार हुसैन, नासिर काज़मी, अहमद मुश्ताक़, फैमिदा रिज़ाब, शकेब जलाली, बानी और प्रियदर्शी ठाकुर ‘ख़याल’ आदि पर इनका लेखन अथवा अनुवाद कार्य सराहनीय है। शम्सुर्ररहमान फ़ारूकी की किताब ‘उर्दू का इब्तिदायी ज़माना’ का ‘उर्दू का आरंभिक युग’, फ़िराक़ गोरखपुरी की ‘उर्दू की इश्किया शायरी’, बानी की ‘कुल्वाते बानी’ अहमद मुश्ताक़ की ‘गिर्दे महताब’, फैमिदा रिजाब की ‘आदमी की जिंदगी’, शकेब जलाली की ‘रौशनी’ आदि उर्दू की अनेक रचनाओं के हिंदी में अनुवाद किए हैं। ईरान के सांस्कृतिक शोध केंद्र से दो खण्डों में प्रकाशित ‘फ़ारसी-हिंदी कोश’(2001) और ‘फ़रहंगे-आर्यन’ (फ़ारसी-हिंदी-अंग्रेजी-उर्दू कोश) के अभी तक प्रकाशित तीन भागों का सह-संपादन किया। इन्होंने उर्दू के उस्ताद चिनानन गोबिन्दपुरी के सानिध्य में उर्दू की बारीकियों को जाना और उनको अपना उस्ताद स्वीकार किया। इनके हिंदी काव्यगुरु त्रिलोचन हैं तो उर्दू के उस्ताद चिनानन गोबिन्दपुरी।
हिंदी-उर्दू के क्लासिकल साहित्य के अलावा संगीत और पेंटिंग में गोबिन्द जी की गहरी रूचि है। वह क्लासिक संगीत के बहुत रसिक हैं। बहुत मन से सुनते हैं। इसका कुछ असर उनके विद्यार्थियों पर भी देखा जा सकता है। यह बहुत अच्छा गाते हैं। जो उनके शागिर्द रहे हैं उन्होंने उनकी गायकी का आनंद उठाया है। उनके पास संगीत की अच्छी समझ है और छोटे-बड़ेकलाकार की बारीक़ पहचान है।
इन्होंने ‘नवभारत टाइम्स’ में बतौर म्यूजिक रिपोर्टर कुछ समय के लिए कार्य किया। हिन्दुस्तानी राग संगीत के महत्त्वपूर्ण ख्याल गायकों पर इनका लिखा हुआ देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपा है। संगीत के बड़े उस्ताद मल्लिकार्जुन मंसूर, कुमार गन्धर्व, किशोरी अमुनकर, नुसरत फ़तेह अली खां, तलत महमूद, जे. स्वामीनाथन, बेग़म अख्तर और शैलेन्द्र पर अविस्मरनीय लिखा। ये सभी लेख ‘आजकल’ या ‘दिनमान’ में प्रकाशित हुए। यह महत्वपूर्ण कार्य जल्द ही हम सभी को पुस्तक के रूप में पढने को मिलेगा।
गोबिन्द जी को संगीत के अलावा पेंटिग का अभिन्न शौक है। इन्होंने युवावस्था में वाणी और राजकमल प्रकाशन के लिए पुस्तकों के कवर पेज बनाए। मुझे लगता है कि उनके हिंदी लेखन के साथ-साथ पेंटिंग्स के इस काम पर हिंदी वालों की नज़र जानी चाहिए। संगीत की तरह गोबिन्द जी का यह कार्य भी अविस्मणीय है। जिन लोगों ने शिवप्रसाद सिंह का उपन्यास ‘नीला चाँद’ पढ़ा है, उसका कवर शायद ही दिमाग से विस्मित होगा! इसके अतिरिक्त महादेवी वर्मा की ‘स्मृति की रेखाएँ’, रामविलास शर्मा की ‘विरामचिन्ह’, ‘रूप तरंग’ और ‘प्रगतिशील कविता की वैचारिक पृष्ठभूमि’,केदारनाथ अग्रवाल की ‘गुलाब और बुलबुल’, नागार्जुन की ‘खिचड़ी विप्लव देखा हमने’ तथा इनकी एक-दो रचनाओं को छोड़कर लगभग सभी रचनाओं के कवर पेज बनाए, शमशेरबहादुर सिंह की ‘काल तुझसे होड़ है मेरी’, त्रिलोचन की ‘अबोला’ और ‘तुम्हें सौंपता हूँ’, भीष्म सहनी की ‘कुंतो’, श्रीलाल शुक्ल की ‘विश्रामपुर का संत’, शिवप्रसाद सिंह की ‘नीला चाँद’, ‘गली आगे मुडती है’, सुरेन्द्र वर्मा की ‘दो मुर्दों का गुलदस्ता’, धर्मवीर भारती की ‘सपना अभी भी’, रामदरश मिश्र की ‘पानी के प्राचीर’ और ‘जल टूटता हुआ’, धूमिल की ‘सुदामा पाण्डे का प्रजातंत्र’, विजयदेव नारायण की ‘साखी’, देवीशंकर अवस्थी की ‘रचना और आलोचना’, ‘भक्ति और सन्दर्भ’ तथा ‘आलोचना और आलोचना’, केदारनाथ सिंह की ‘मेरे समय के शब्द’, नित्यानंद तिवारी की ‘सृजनशीलता का संकट’ संजीव की ‘सूत्रधार’, विनोदकुमार शुक्ल की ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’,विजयमोहन सिंह की ‘शेरपुर पन्द्रह मील’, रमेश कुंतक मेघ की ‘अथातो सौन्दर्य जिज्ञासा’, कर्णसिंह चौहान की ‘प्रगतिवादी आन्दोलन का इतिहास’ उदय प्रकाश की ‘तिरिछि’, हरभजन सिंह की ‘कोई देख रहा है’, नरेन्द्र कोहली की ‘महासमर’, रंजना अरगड़े की ‘कवियों का कवि शमशेर’, रमेश रंजक की ‘दरिया का पानी’ कुमार विमल की ‘सपने में एक औरत से बातचीत’, समीक्षा ठाकुर की ‘कहना न होगा’आदि महत्वपूर्ण रचनाओं के कवर पेज बनाए। पुस्तक का कवर पेज बनाना आसान नहीं होता। जितना कि हम सोचते हैं। कवर पेज और उसकी डिजाइन में पुस्तक की अंतर्वस्तु प्रतिबिम्बित होती है। कई बार पुस्तक हाथ में आते ही उसका कवर पेज आपसे बातें करने लगता है और आप उसके विषय का अनुमान कर लेते हैं।
गोबिन्द जी ने न केवल किताबों के कवर पेज बनाए अपितु ‘आजकल’, ‘कथादेश’, ‘तद्भव’, ‘अपेक्षा’, ‘जे.एन. यू परिसर’ के लिए आवरण से लेकर कैलीग्राफ़ी भी की। पंकज बिष्ट के ज़माने में ‘आजकल’ के लिए की गई कैलीग्राफ़ी आज तक चल रही है। ‘इण्डिया टुडे’ की वार्षिकी और ‘अहा! जिंदगी’ पत्रिकाओं में गोबिन्द जी की पेंटिंग्स छप चुकी हैं। नागार्जुन का जो चित्र सबसे ज्यादा पोपुलर है। वह गोबिन्द जी द्वार बनाया गया पेन्सिल का अद्भुत स्केच है। इस सत्य से बहुत कम लोग परिचित हैं।
गोबिन्द जी मूलतः हिंदी साहित्य के व्यक्ति हैं। लेकिन उनकी आवाजाही हिंदी-उर्दू-फ़ारसी में समान है। हिंदी में उनके अब तक चार कविता संग्रह ‘कोई ऐसा शब्द दो’(1996), ‘मैं नहीं था लिखते समय’(2007), ‘वर्तमान की धूल’(2014), यह तीसरा पहर है(2018) आलोचना की पांच किताब ‘त्रिलोचन के बारे में’ (संपादन-1994), ‘कविता के सम्मुख’(2002), ‘केदारनाथ सिंह की कविता : बिम्ब से आख्यान तक’(2013), ‘कविता का पार्श्व’(2013), ‘शमशेर एक अभिनव राग’(2018), नामवर सिंह के साथ ‘मलयज की डायरी’ का सन 2000 में सह संपादन, ‘केदारनाथ सिंह की पचास कविताएँ’(2012), कवि ने कहा : ‘केदारनाथ सिंह की कविताएँ’(2014) और राजकमल से शीघ्र प्रकाशित ‘त्रिलोचन रचनावली’ का संपादन महत्त्वपूर्ण कार्य हैं।
समकालीन हिंदी कविता में गोबिन्द जी प्रगतिशील काव्यधारा के अन्यतम रचनाकार हैं। विद्यार्थी जीवन से उनका झुकाव मार्क्सवादी विचारधारा की तरफ रहा और शिक्षक जीवन में वह लम्बे समय तक जनवादी लेखक संघ (जलेस) के उपाध्यक्ष रहे। गोबिन्द जी कभी सस्ती लोकप्रियता के पीछे नहीं भागे। वह लेखकों की खेमेबाज़ी से दूर ‘एकला चला रे’ पर विश्वास करते रहे हैं। उनके लेखन की गंभीरता इस बात का सबूत है कि वह साहित्य को खण्डशः देखना पसंद नहीं करते। उन्होंने साहित्य को सदैव सदाशयता में देखा है। शायद इसलिए वह अस्मितामूलक विमर्शों से दूर रहे। विमर्शों से दूर रहकर भी उन्होंने कविता और आलोचना में अस्मितामूलक विमर्श और उनके दुःख दर्द को गहराई से अभिव्यक्त किया है। इनकी कविताओं में दलित जीवन से सम्बधित अनेक पंक्तियाँ जगह-जगह बिखरी हुई हैं- ‘और क्या देखने को बाक़ी है’ कविता में ‘किसी ने सच ही कहा था/ सात जनम भी गर इन सवर्णों का मैला सर पर ढोओगे/ याद रखना तो भी तुम कभी सवर्ण नहीं बन पाओगे’ (वर्तमान की धूल, पृष्ठ-54),‘जब में बोलता हूँ’ कविता में‘जब में बोलता हूँ…/ तो दरअसल बोलता कहाँ हूँ/ अन्दर-ही-अन्दर खौलता हूँ रह-रहकर/ कहीं अपने को टटोलता हूँ/ भीतर-ही भीतर/ उस भाषा में/ जिसमें इस हत्यारी संस्कृति की समाही हो नहीं सकती’ (यह तीसरा पहर था, पृष्ठ-7),‘सर्जना का रंग’ कविता में ‘शब्दों से डराते हो मुझे/ मेरी कविता चुराकर दिखाओ/ अपनी अमीरी का ख़ौफ़ दिखाते हो मुझे/ मेरी ग़रीबी चुराकर दिखाओ/…तुमने ज़मीनें हड़पीं, फसलें जलायीं, खेत चुराए/ धरती की कोख चुराकर दिखाओ/ धरती की कोख में हर पल खिलने वाली/ सर्जना का हरा रंग चुराकर दिखाओ/ दिखाने के लिए है क्या तुम्हारे पास…(उपर्युक्त, पृष्ठ-8)। इनके सम्पूर्ण काव्य में इस तरह की कई चमकदार पंक्तियाँ हैं। जिनमें दलित और स्त्री जीवन के अनेक धूल-धूसरित रंग बिखरे हुए हैं।
गोबिन्द जी की कविता का मूल कथ्य गहन मानवीय संवेदना से सम्पृक्त है। उसमें प्रेम, सौन्दर्य, प्रकृति, स्मृति, राजनीति, संगीत और राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय समसामयिक घटनाओं से उपजी पीड़ाजन्य अनुभूति की अनेक अनुगूँजें दर्ज हैं। इनकी कविताओं में पक्षियों के बसेरों के उजड़ने और उनके दुःख को न समझ पाने की पीड़ा है। ‘आदतों की गुलामी’ करने और उसे पूरी जिन्दगी न समझ पाने की अज्ञात विवशता है और लाखों मेहनतकश व्यक्तियों के दुःख दर्द को काव्यबद्ध करने की अकुलाहट भी है। इस अकुलाहट में मुखरता नहीं अपितु सर्जना की अनुभूति को पा लेने की विनम्र कोशिश है। जिसे हर प्रबुद्ध लेखक पाने के लिए भटकता रहता है। केदारनाथ सिंह ने इनकी काव्य भाषा को नोटिस करते हुए ‘वर्तमान की धूल’ काव्य संग्रह के फ्लैप पर बहुत सटीक लिखा है, “इस कवि ने हिंदी और उर्दू काव्य भाषा की बहुत सी दूरियाँ ध्वस्त कर दी हैं और इस तरह एक नयी काव्य-भाषा बनती हुई दिखती है। इसे गोबिन्द प्रसाद की एक काव्यगत सफलता के रूप में देखा जाना चाहिए। यह वह परम्परा है जिसकी शुरुआत कभी शमशेर ने की थी और गोबिन्द प्रसाद इसे आज की जरूरत के मुताबिक एक नए अंदाज़ में आगे ले जाने की कोशिश कर रहे हैं।” गोबिन्द जी का सम्पूर्ण लेखन पढने के बाद मैं कह सकता हूँ कि इनके पास पुरखों की ऐसी विरासत है जिसमें कहीं शमशेर हैं, कहीं अज्ञेय हैं, कहीं काव्य गुरु त्रिलोचन हैं, कहीं केदारनाथ सिंह हैं, कहीं उर्दू की कालजयी विरासत है, कहीं संगीत की ध्वनियाँ हैं, कहीं चित्रकला की अमूर्त और अव्याखेय दुनिया है। अतः इनका सम्पूर्ण लेखन उस परफेक्शन की खोज है जिसे पाने के लिए कवि या कलाकार भटकते रहते हैं। इस भटकाव के दौरान इन्होंने कविता, आलोचना और डायरी में अद्भुत लेखन किया है। यही एक लेखक की अपूर्णता से पूर्णता की यात्रा भी है।